जानें शास्त्रों में भोजन करने के 20 नियम

जानें शास्त्रों में भोजन करने के 20 नियम

जानें शास्त्रों में भोजन करने के 20 नियम

shastron mein bhojan karne ke 20 niyam

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अधिकांश मानव(Manav) सही भोजन( bhojan / khana ) विधि नहीं जानते हैं । इससे उनकी जठराग्नि बिगडती है ।

1. भोजन का पात्र सुवर्ण का हो तो आयुष्य को टिकाये रखता है, आँखों का तेज बढाता है । चाँदी के बर्तन में भोजन करने से आँख की शक्ति बढती है, पित्त नाश होता है और वायु तथा कफ समाप्त होते हैं । कांसे के बर्तन में भोजन करने से बुद्धि बढती है, रक्त तथा पित्त को शुद्ध करता है । लोहे के बर्तन में भोजन करने से सूजन तथा पीलापन नहीं रहता, शक्ति बढती है और पीलिये के रोग में फायदा होता है । पत्थर या मिट्टी के बर्तनों में भोजन करने से लक्ष्मी क्षय होता है । लकडी का बर्तन रुचिकर तथा कफ-नाशक है । पत्तों का बर्तन भोजन में रुचि उत्पन्न करता है, जठराग्नि को प्रज्ज्वलित करता है, जहर तथा पाप को नाश करता है ।

2. पानी पीने के लिए ताम्र पात्र उत्तम है । यह उपलब्ध न हो तो मिट्टी का पात्र भी हितकारी है ।

3. भोजन करते समय चित्त को एकाग्र रखकर सबसे पहले मिष्ठान्न पदार्थ, फिर खट्टे और खारे और अंत में तीते और कडवे पदार्थ खाने चाहिये । दािडम आदि फल तथा गन्ना भी पहले लेना चाहिए भोजन के बाद आटे के भारी पदार्थ, नये चावल या चूडा नहीं खाना चाहिये ।

4. भोजन चबा-चबाकर खाना चाहिये । भोजन में बीस या पचीस मिनट का समय बिताना चाहिए । जल्दी भोजन करनेवाले का स्वभाव क्रोधी होता है । भोजन अत्यंत धीमी गति से भी नहीं करना चाहिए ।

5. अत्यन्त गरम अन्न बल का ह्रास करता है । ठंडा या सूखा भोजन देर से पचता है ।

6. पहले घी के साथ कठिन पदार्थ खाने, फिर कोमल व्यंजन खाने और बाद में प्रवाही पदार्थ खाने चाहिये । भोजन के पश्चात् तुरन्त पानी नहीं पीना चाहिये ।

7. माप से अधिक खाने से पेडू चढ जाता है । आलस आता है, शरीर भारी होता है और पेट में से आवाज आती है । माप से कम अन्न खाने से शरीर दुबला होता है और शक्ति का क्षय होता है ।

8. बिना समय के भोजन करने से शक्ति का क्षय होता है । बिना समय के भोजन करने से शरीर अश्क्त बनता है , सिरदर्द और अजीर्ण के भिन्न-भिन्न रोग होते हैं, समय बीत जाने पर भोजन करने से अग्नि वायु से कमजोर हो जाती है इससे खाया हुआ शायद ही पचता है और दुबारा भोजन की इच्छा नहीं होती ।

9. जितनी भूख हो उससे आधा भाग अन्न से, पाव भाग जल से भरना चाहिए और पाव भाग वायु के आने जाने के लिए खाली रखना चाहिए ।

10. भोजन से पूर्व पानी पीने से पाचनशक्ति कमजोर होती है, शरीर दुर्बल होता है । भोजन के बाद तुरन्त पानी पीने से आलस बढता है और भोजन नहीं पचता|           
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11. भोजन ( bhojan / khana ) के बाद नमक से मुँह साफ करके गीले हाथ से आँख का स्पर्श करना चाहये । हथेली में पानी भरकर आँख को उसमें डूबाने से आँख की शक्ति बढती है ।

12. भोजन के बाद पद्धतिपूर्वक वज्रासन करना तथा दस से पन्द्रह मिनट बाँई करवट सो जाना चाहिये ।

13. प्यासे व्यक्ति को भोजन नहीं करना चाहिए । प्यासा व्यक्ति अगर भोजन करता है तो उसे आँतो के भिन्न भिन्न रोग होते हैं ।

14. भूखे व्यक्ति को पानी नहीं पीना चाहिए । भूख लगी हो किंतु भूख शान्त किये बिना पानी पीने से जलोदर (उदर में पानी भर जाने का रोग) होता है ।

15. भोजन के बाद मूत्र प्रवृत्ति करना जिससे आयुष्य की वृद्धि होती है । मूत्र प्रवृत्ति के बाद तुरन्त पानी पीना लाभकारी नहीं है ।

16. मूत्र करने की इच्छा हुई हो तब पानी पीना, भोजन करना, मैथुन करना आदि भी हितकारी नहीं है । कारण कि ऐसा करने से पेशाब के भिन्न भिन्न रोग होते हैं, ऐसा वेदों में स्पष्ट बताया गया है ।

17. मनुष्य को सुबह और शाम दो बार भोजन करना चाहिए । दो समयों के बीच में भोजन नहीं करना चाहिये । दोनों भोजनों के बीच में बार-बार चाय पीना, नाश्ता (तामस पदार्थ) आदि करने से पाचनशक्ति कमजोर होती है;

18. ऐसा व्यवहार में मालूम पडता है । दोनों भोजनों के बीच में कम से कम छः से आठ घंटों का अन्तर रखना चाहिए व्यवहार में हम देखते हैं कि पाँच मिनट पहले भोजन की अरुचि बतानेवाला व्यक्ति पाँच मिनट बाद भोजन करने को तैयार हो जाता है । तब वह व्यक्ति इन्द्रियगत संयम न होने के कारण भोजन करने तैयार हो जाता है । सचमुच उस व्यक्ति का पूर्व किया हुआ भोजन पचा नहीं है; फिर भी आहार करता है, इससे उसके शरीर में अनेक रोग घर कर जाते हैं । रोग का कारण पाचनशक्ति का मंद पडना ही है ।

19. भोजन ( bhojan / khana ) करते समय माता-पिता, मित्र, वैद्य, रसोईया, हंस, मोर, सारस या चकोर पक्षी की दृष्टि उत्तम मानी जाती है । किंतु गरीब, सामान्य, भूखे, पापी, पाखंडी या रोगी मानव, मुर्गा और कुत्ते की नजर अच्छी नहीं मानी जाती ।

20. सही भूख को पहचानने वाले मानव बहुत कम हैं । इससे, भूख न लगी हो फिर भी भोजन करने से रोगों की संख्या बढती जाती है । सुबह भोजन किया हो और शाम को शुद्ध डकार आये, आलस तथा बेचैनी न रहें, मल, मूत्र, वायु, योग्य ढंग से होता रहे, शरीर हलका रहे , भोजन के प्रति रुचि हो तब समझना चाहिए कि भोजन पच गया है । पूर्व किया हुआ भोजन पच जाय तभी फिर भोजन करना चाहिए ।

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