नारद पुराण – narada purana in hindi online

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नारद पुराण – narada purana in hindi online

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नारद पुराण परम पुनीत सर्व कष्ट निवारक, सर्व सुख प्रदाता पुराण है। इस परम पुनीत पुराण में प्रवृत्ति और निवृत्ति का सार गर्भित एवं विस्तृत विवेचन किया गया है वैसा अन्य जगह मिलना दुर्लभ है।

 

यह पुराण नैमिषारण्य में एक बहुत बड़े सम्मेलन से शुरू हुआ है। इस सम्मेलन में मुख्यतः चार विषयों पर गम्भीर विचार हुआ जैसे पृथ्वी पर कौन-कौन-से क्षेत्र पवित्र हैं…, विष्णु के चरणों में अनन्य भक्ति पाने का सरल उपाय…, आदि। महर्षि शोनक ने सुझाया महाराज सूतजी सर्वश्रेष्ठ पौराणिक प्रवक्ता हैं। इसलिए समस्या का समाधान सूतजी ही कर सकते हैं। सूतजी ने बड़ी शान्ति से जिज्ञासाओं की प्रश्नावली सुनकर इन सभी शंकाओं का निराकरण करने के लिए नारद पुराण को सुनाया। यह पुराण सभी पापों को नाश करने वाला है, दुःस्वप्न की चिन्ता का निवारण करने वाला है, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का हेतुरूप है।

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यह पुराण परम गोपनीय है साथ ही यह केवल श्रद्धालु एवं निष्ठावान भक्तों के लिए ही प्रयोग योग्य है। इसका वाचन किसी पवित्र स्थान पर होना चाहिए। यह मूल रूप से वैष्णव प्रकृति व प्रवृत्ति का पुराण है। इसे दो खण्डों में विभाजित किया है। प्रथम खंड के शुरुआत में इसमें ब्रह्माजी के चार मानव पुत्र सनक, सनंदन, सनातन, तथा सनत्कुमार की कथा है। जिसमें उन्होंने नारद जी से कुछ शंकाओं का निवारण करने के लिए प्रार्थना की। इसके बाद उन्होंने मार्कण्डेय की कथा सुनाई। तीर्थ गंगा के महत्त्व व पूजन को बताया गया है। उसके आगे सूर्यवंशी राजा वृक के बाहु की कथा है। जिसमें आगे जाकर कपिल मुनि द्वारा सगर पुत्रों को भस्म करने की तथा अंशुमान को गंगा को नीचे उतारकर उनके उद्धार तक की कथा है। आगे गुरु का स्वरूप बतलाते हुए ब्रह्मराक्षस ने बारह प्रकार के गुरुओं का उल्लेख किया है।

आगे सनक मुनि द्वारा भगवान् विष्णु के वामन रूप में देवताओं के संकट दूर करने और बलि के अहंकार को नष्ट करने की कथा कही गई है।

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इसमें अन्नदान, विद्यादान से प्राप्त होने वाले लोगों के बारे में बताया है। बुद्धिमान् व्यक्ति के द्वारा पांच प्रकार के श्राद्ध को बताया है, परस्त्रीगामियों, विश्वासघात करने वालों, मंदिर में अथवा सरोवर में मल त्याग करने, वेद और चंदनादि आदि गलत कार्य करने वालों को किस तरह का नरक भुगतना पड़ता है का सविस्तार वर्णन आगे सनक मुनि ने नारदजी की जिज्ञासाओं को संतुष्ट करते हुए उनसे सत्कर्मों का उल्लेख  किया है।

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द्वितीय खंड में समस्त तपों, व्रतों धर्मानुष्ठानों एवं दान आदि के निष्पादन की विधियां हैं, नियत काल है एवं तिथियां हैं। इसके अन्तर्गत गौ वध होने पर प्रायश्चित, चोरी में प्रायश्चित, आनजाने में मां बहन से यौन संसर्ग करने पर प्रायश्चित के तरीके बताए गए हैं। आगे विष्णु मंदिर का निर्माण कराया। साथ ही इसमें बताया है ब्रह्माजी का एक दिन होता है एक में चौदह मनु, चौदह इंद्र और चौदह ही प्रकार के भिन्न-भिन्न देवता होते हैं। इसकी तालिका दी गई है। सत्ययुग से लेकर कलियुग के बारे में बताया गया है। अंत में वेद के अंगों का संक्षिप्त परिचय दिया गया है। जिसमें शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुकत, छन्दों का वर्णन है। अतः इसे पुराण का श्रवण और श्री नारायण में श्रद्धापूर्वक अनुरक्ति से मनुष्य अपने जीवन का सफल काम करता हुआ मुक्ति का अधिकारी हो जाता है। श्री नारद पुराण श्रेष्ठ है इसका पठन एवं श्रवण उपकारी है। अंततः यह कहेंगे इस पुराण में गोपनीय अनुष्ठान, धर्मनिरूपण तथा भक्ति महत्त्वपरक विलक्षण कथाएं आदि का अलौकिक महत्त्वपूर्ण व्याख्यान प्राप्त होता है। narada purana in hindi pdf free download

 

नारद पुराण

एक बार नैमिषारण्य में एक बहुत बड़ा सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन में बड़े-बड़े तपस्वी, तत्त्वज्ञानी और स्वाध्याय प्रेमी ऋषि मुनि पधारे। इस सम्मेलन में मुख्यतः इन चार विषयों पर गम्भीर विचार हुआ।

1. इस पृथ्वी पर कौन-कौन से क्षेत्र पवित्र हैं और तीर्थ स्थान हैं जहां वास करने से मनुष्य का कल्याण हो सकता है ?

2. इस संसार में आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक तापों से दुःखी मनुष्यों की मुक्ति का सरल उपाय क्या हो सकता है ?3. विष्णु के चरणों में अनन्य भक्ति पाने का सरल उपाय क्या है?

4. दैनिक धर्म कर्म करते हुए मनुष्य अपने दायित्व का पालन करते हुए किस तरह अपना अभीष्ट पूर्ण कर सकता है।

सभी महर्षियों एवं मुनियों ने अपने-अपने विचार रखे। सभी के भिन्न मत देखकर महर्षि शौनक ने उसमें सामंजस्य की भावना से संबोधित करते हुए यह सुझाया कि महाराज सूतजी सर्वश्रेष्ठ पौराणिक प्रवक्ता हैं। ये श्री लोमहर्षण के सुपुत्र और महर्षि वेदव्यास के शिष्य हैं। अतः यदि हम सब वास्तव में अपनी समस्या का समाधान चाहते हैं तो सिद्धारम में विष्णुभक्ति में लीन सूतजी के समक्ष चलना होगा।narada purana in hindi pdf 

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सम्मेलन में उपस्थित सभी ऋषियों ने शौनक मुनि के प्रस्ताव को स्वीकार कर सिद्धाश्रम की ओर प्रस्थान किया। सूतजी ने सभी ऋषियों का यथोचित स्वागत सत्कार किया और विश्राम के पश्चात् उनसे आने का प्रयोजन पूछा। जिज्ञासु मुनियों ने अपना मंतव्य स्पष्ट करते हुए कहा कि हे प्रभु ! आप सर्वज्ञानी हैं कृपया हमारी जिज्ञासा शांत करें-

1. त्रिलोकीनाथ और संसार के रचना करने वाले,पालन करने वाले और प्रलयंकारी भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने के लिए मनुष्य को क्या उपाय करने चाहिए ?

2. मनुष्य को सांसारिक आवागमन से मुक्ति के लिए क्या उपाय करने चाहिए ?

3. ईश्वर भक्ति से क्या प्रभाव पड़ता है तथा ईश्वरभक्तों का स्वरूप कैसा होता है ?

4. अतिथियों का स्वागत किस प्रकार करना चाहिए ?

5. आश्रम तथा वर्ण-व्यवस्था का वास्तविक स्वरूप क्या है ?

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तत्त्वज्ञानी सूतजी ने बड़ी शांति से जिज्ञासुओं की प्रश्नावली सुनकर इन सभी शकाओं का निराकरण करने के लिए नारद पुराण सुनाने का उपक्रम किया। सूतजी ने बताया कि वेदाशास्त्रसम्मत यह पुराण सभी पापों का नाश करने वाला, अनिष्ट दूर करने वाला, दुःस्वप्न और चिन्ता का निराकरण करने वाला, भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला है। यह धर्म, अर्थ काम मोक्ष का हेतुरूप है। यह पुराण आख्यान इतना अधिक प्रभावकारी है कि शुद्ध मन से इसका श्रणव करने से ब्रह्महत्या, मदिरापान गुरुपत्नी-रमण जैसे महापातकों और मांस भक्षण वैश्यागमन जैसे उपपातकों से भ्रष्ट से भ्रष्ट व्यक्ति भी पापमुक्त हो जाता है।

 

ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के दिन मूलनक्षत्र में मथुरा में स्नान करके विधिवत् व्रत-उपवास करके भगवान कृष्ण की पूजा उपासना करते हुए श्री नारद पुराण का श्रवण करें तो भक्ति जन्म-जन्मान्तरों के पाप से मुक्त हो जाता है। माया के जाल से मुक्त होकर निरंजन हो जाता है। भगवान् विष्णु के चरणों में वृत्ति रखने वाला संसार के प्रति अनासक्त होकर फलस्वरूप जीव मुक्ति को प्राप्त करता हुआ वैकुंठ वासी हो जाता है।

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सूतजी ने स्पष्ट करते हुए कहा कि यह पुराण परम गोपनीय है। यह केवल श्रद्धालु एवं निष्ठानवान भक्तों के लिए ही प्रयोग योग्य है। इसीलिए असत् कर्मों में लिप्त, ब्राह्मणद्रोही, ढोंगी दंभी छपी-कपटी को भूलकर भी इसका श्रवण नहीं करना चाहिए। कहा गया है कि भगवान् भक्ति से प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिए इस नारद पुराण में श्री विष्णु भगवान् की लीलाओं और महिमा का बड़ा ही मनोरम वर्णन है जिसके सुनने से भक्त सभी राग-विराग, द्वेषभाव से मुक्त विष्णु के अनुराग में उन्हीं का होकर रह जाता है।

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यह नारद पुराण स्वयं पवित्र है इसलिए वाचन किसी पवित्र स्थान पर होना चाहिए। जिसके लिए कोई भी मंदिर कोई तीर्थ अथवा एकांत, शांत-स्थान और वाचक स्वयं शुद्ध पवित्र भाव वाला, जन्म से ब्राह्मण विद्वान् और आचारवान होना चाहिए। श्रोता को एकाग्रचित होकर इसका श्रवण करना चाहिए। यह आवश्यक है कि श्री नारद पुराण का श्रवण शुद्ध मन से, निःस्वार्थ भाव और बिना किसी प्रदर्शन के करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति मूर्खतापूर्वक या दंभ में, शुद्ध भावना के अभाव में केवल, प्रदर्शन के लिए नारद पुराण सुनता है तो ऐसा व्यक्ति अनन्त काल तक घोर नारकीय यातनायें सहता है अर्थात् शुद्ध चित्तवृत्ति से ही उसका पारायण लाभप्रद है। वेद निन्दा करने वालों के समान ही पुराण निन्दा करने वाले भी नास्तिक ही होते हैं। भगवान् वेद व्यास ने यह पुराणआख्यान जीवों के कल्याण के लिए ही रचा है। इसलिए इसका श्रवणआराधन चित्तवृत्तियों को केन्द्रित करके पूर्ण श्रद्धाभक्ति से करना चाहिए। मनुष्य के जीवन की सार्थकता पुरुषार्थ चतुष्टाय को प्राप्त करने में ही है और इसका सरल उपाय सकल विश्व के स्वामी सर्वव्यापी, अनित्य, अमर और सर्वान्तरयामी श्री विष्णु में अटूट भक्ति है। पुराणों का श्रवण इस भक्ति का सरलतम साधन है। इन कथाओं के श्रवण भक्त का भगवान् में मन लग जाता है तथा जन्म-मरण के झंझटों से वह निवृत्ति को प्राप्त हो जाता है। यह कहते हुए महर्षि सूतजी ने ऋषियों से कहा कि संपूर्ण वेदों और शास्त्रों के गूढ़ तत्त्वों को प्रकाशित करने वाला पुराणों में विशिष्ट यह नारद पुराण मैं आपको सुनाता हूं। मुझे विश्वास है-यदि शुद्ध मन से आपने इसका श्रवण किया तो आपकी सभी जिज्ञासाओं और शंकाओं का निराकरण हो जायेगा।

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