नारी धर्म ,- nari dharma in hindi pdf online

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नारि सुभाउ सत्य सब कहहीं। अवगुन आठ सदा उर रहहीं।।

साहस अनृत चपलता माया। भय अबिबेक असौच अदाया।

 

अतएव उनके स्वतन्त्र हो जाने से- अत्याचार, अनाचार, व्यभिचार आदि दोषों की वृद्धि होकर देश, जाति, समाज को बहुत ही हानि पहुँच सकती है। इन्हीं सब बातों को सोचकर मनु आदि महर्षियोंने कहा है।

 
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बालया वा युवत्या वा वृद्धया वापि योषिता।

न स्वातन्त्र्येण कर्तव्यं किञ्चित् कार्य़ं गृहेव्षपि।।

बाल्ये पितुर्वशे तिष्ठेत् पाणिग्राहस्य यौवने।

पुत्राणां भर्तरि प्रेते न भजेत् स्त्री स्वतन्त्रताम्।।

(मनु० 5। 147- 148)

 

बालिका, युवती वा वृद्धा स्त्री को भी (स्वतन्त्रतासे  बाहरमें नहीं फिरना चाहिये और) घऱों में भी कोई कार्य स्वतन्त्र होकर नहीं करना चाहिये। बाल्यावस्थामें स्त्री पिताके वशमें, यौवनावस्था में पति के अधीन और पति के मर जानेपर पुत्रों के अधीन रहे, किंतु स्वतन्त्र कभी न रहे।

 
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यह बात प्रत्यक्ष भी देखने में आती है कि जो स्त्रियाँ स्वत्रन्त्र होकर रहती हैं, वे प्रायः नष्ट-भ्रष्ट हो जाती हैं। विद्या, बुद्धि एवं शिक्षा के अभाव के कारण भी स्त्री स्वतन्त्रता के योग्य नहीं है।

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