भक्त वेंकट

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भक्त वेंकट और रमाया

दक्षिण में पुलिवेंदला के समीप पापघ्नी नदी के किनारे पर एक छोटे से गाँव में वेंकट नामक एक ब्राह्मण निवास करता था। ब्राह्मण भगवान श्री रंगनाथ जी का बड़ा भक्त था। वह दिन-रात भगवान के पवित्र नाम का जप करता।ब्राह्मण की पत्नी का नाम था रमाया । वह भी पति की भाँति ही भगवान का भजन किया करती थी। माता-पिता मर गये थे, कोई संतान थी नहीं, इसलिए घर में ब्राह्मण-ब्राह्मणी दो ही व्यक्ति थे। दोनों में परस्पर बड़ा प्रेम था।
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पिता राजपुरोहित थे, इससे उन्हें अपने यजमानों से यथेष्ट धन संपत्ति मिली थी। उन्होंने मरते समय कहा था –‘बेटा! मेरी पूजा के कमरे से दक्षिण वाली कोठरी में सात कलसे सोने की मोहरों के गड़े हैं। मैंने बड़े परिश्रम से धन कमाया । मुझे दुख है कि मैं अपने जीवन में इसका सदुपयोग न कर सका। बेटा! धन की तीन गतियाँ होती हैं। सबसे उत्तम गति यह है कि अपने हाथों ही उसे सत्कर्म के द्वारा भगवान की सेवा में लगा दिया जाय। यदि भगवान की कृपा से पुत्र सत्त्वगुणी होता है तो मरने के बाद धन सत्कार्य में लग जाता है; नहीं तो, वही धन कुपुत्र के द्वारा बुरे काम में लगकर पीढियों तक को नरक पहुँचाने में कारण बनता है। बेटा ! तू सुपूत है– इससे मुझे विश्वास है कि तू धन का दुरुपयोग नहीं करेगा। मैं चाहता हूं कि इस सारे धन को तू भगवान की सेवा में लगाकर मुझे शान्ति दे। बेटा! धन तभी अच्छा है जब कि उससे भगवत्स्वरूप दुखी प्राणियों की सेवा होती है। केवल इसीलिए धनवानों को ‘भाग्यवान्’ कहा जाता है । नहीं तो धन के समान बुरी चीज नहीं है । धन में एक नशा होता है जो मनुष्य के विवेक को हर लेता है और नाना प्रकार से अनर्थ उत्पन्न करके उसे अपराधों के गड़हे में गिरा देता है । भगवान श्री कृष्ण ने भक्त राज उद्धव जी से कहा है—-भक्त, वेंकट,  रमाया,भक्त वेंकट ,

स्तेयं हिंसानृतं दम्भः कामः क्रोधः स्मयो मदः ।

भेदो वैरमविश्वासः संस्पर्धा व्यसनानि च।।

एते पंचदशानर्था ह्यर्थमूला मता नृणाम्।

तस्मादनर्थमर्थाख्यं श्रेयोऽर्थी दूरस्त्यजेत्।।

‘चोरी, हिंसा, झूठ बोलना, पाखण्ड, काम, क्रोध, गर्व, मद, ऊँच-नीच की और अपने पराये की भेद बुद्धि, वैर, अविश्वास, होड़, लम्पटता, जुआ और शराब– इन पंद्रह अनर्थों की जड़ मनुष्य में यह अर्थ (धन) ही माना गया है।इसलिए अपना कल्याण चाहने वाले पुरुष को चाहिए कि इस ‘अर्थ ‘ नामधारी ‘अनर्थ’ को दूर से ही त्याग दे।’
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‘बेटा! मैं इस बात को जानता था, इसी से मैंने तुझको आजतक इस धन की बात नहीं बतायी। मैं चाहता था कि इसे अपने हाथ से भगवान की सेवा में लगा दूं; परंतु संयोग ऐसे बनते गये कि मेरी इच्छा पूरी न हो सकी। मेरे प्यारे वेंकट! संसार में सभी पिता अपने पुत्र के लिए धन कमाकर छोड़ जाना चाहते हैं, परंतु मैं ऐसा नहीं चाहता। बेटा! मुझे प्रत्यक्ष दीखता है कि धन से मनुष्य में दुर्बुद्धि उत्पन्न होती है । इससे मैं तुझे अर्थ का धनी न देखकर भजन का धनी देखना चाहता हूँ ।इसीलिए तुझसे यह कहता हूँ कि इस सारे धन को तू भगवान की सेवा में लगा देना। तेरे निर्वाह के लिए घर में जो पैतृक सम्पत्ति है- – जमीन है, खेत है और थोड़ी बहुत यजमानी है, वही काफी है । जीवन को सादा, संयमी और त्याग से सम्पन्न रखना , सदा सत्य का सेवन करना और करना श्री रंगनाथ भगवान का भजन। इसी से तू कृतार्थ हो जायगा और इसी से तू पुरखों को तारने वाला बनेगा। बेटा ! मेरी इस अन्तिम सीख को याद रखना।’
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वेंकट अपने पिता से भी बढ़कर विवेकी था। उसने कहा-‘पिता जी! आपकी इस सीख का एक एक अक्षर अनमोल है । सच्चे हितैषी पिता के विना ऐसी सीख कौन दे सकता है? मुझे यह धन न देकर आपने मेरा बड़ा उपकार किया है ।मैं आपकी आज्ञा को सिर चढ़ाता हूँ और आपके संतोष के लिए धन की ओर ध्यान देकर इसे शीघ्र ही भगवान की सेवा में लगा दूंगा । अब आप इस धन का ध्यान छोड़कर भगवान श्री रंगनाथ जी का ध्यान कीजिए और शान्ति के साथ उनके परमधाम को पधारिये ।मेरी माता ने मुझे जैसा आशीर्वाद दिया था , वैसे ही आप भी यह आशीर्वाद अवश्य देते जाइये कि मैं कभी भगवान को भूलूं नहीं – मेरा जीवन भगवत्परायण रहे और आपकी यह पुत्रवधू भी भगवान की सेवा में ही संलग्न रहकर अपने जीवन को सफल करे।’

पिता ने ‘तथास्तु’ कहकर भगवान में ध्यान लगाया और भगवान के नाम की ध्वनि करते करते ही उनका मस्तक फट गया। वेंकट और रमाया ने देखा—एक उजली सी ज्योति मस्तक से निकलकर आकाश में लीन हो गयी।
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वेंकट ने पिता का संस्कार किया, फिर श्राद्ध में समुचित ब्राह्मण भोजनादि करवाकर पिता के आज्ञानुसार स्वर्ण मुहरों के घड़ों को निकाला और तमाम धनराशि गरीबों की सेवा के द्वारा भगवत्सेवा में लगा दी गई ।
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तब से वेंकट और रमाया की निष्ठा और भी दृढ़ हो गई । उन्होंने अपना सारा जीवन साधनामय बना डाला।दोनों एक ही भगवत्पथ पर चलते थे और दोनों से ही दोनों को बल मिलता था।
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एक दिन दोनों ही भगवान के प्रेम में तन्मय होकर उनको अपने सामने मानकर-अन्तर के नेत्रों से देखकर नाच रहे थे और मस्त होकर कीर्तन कर रहे थे। भगवान यों तो प्रतिक्षण भक्तों के समीप रहते हैं पर आज तो वे वहाँ प्रत्यक्ष प्रकट हो गए और उन्हीं के साथ थिरक थिरककर नाचने लगे। भक्त भगवान पर मुग्ध थे और भगवान भक्तों पर। पता नहीं – यह आनन्द का नाच कितने समय तक चलता रहा। भगवान की इच्छा से जब वेंकट-रमाया को बाह्य ज्ञान हुआ तब उन्होंने देखा, दोनों का एक एक हाथ एक एक हाथ से पकड़े अपने भगवान श्री रंगनाथ दोनों के बीच में खड़े मन्द मन्द मुस्करा रहे हैं । भगवान को प्रत्यक्ष देखकर दोनों निहाल हो गए । आनन्द का पार नहीं था। उनके शरीर प्रेमावेश से शिथिल हो गये । दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। भगवान ने उठाकर दोनों के मस्तक अपनी दोनों जांघों पर रख लिये और उन पर वे अपने कोमल करकमल फिराने लगे। इतने में दिव्य विमान लेकर पार्षदगण पहुँच गए । भगवान अपने उन दोनों भक्तों सहित विमान पर सवार होकर वैकुण्ठ पधार गये। कहना नहीं होगा कि भगवान के संस्पर्श से दोनों के शरीर पहले ही चिन्मय दिव्य हो गये थे।

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