सत्संग की महिमा और साथ मे सत्संग से संबंधित एक लघु दृष्टान्त

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सत्संग की महिमा और साथ मे सत्संग से संबंधित एक लघु दृष्टान्त 

* तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।

तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥

भावार्थ:-हे तात! स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाए, तो भी वे सब मिलकर (दूसरे पलड़े पर रखे हुए) उस सुख के बराबर नहीं हो सकते, जो लव (क्षण) मात्र के सत्संग से होता है॥

हमारे ग्रन्थ पुराणों, संत-महात्माओं और भगवन ने सत्संग की अनंत महिमा गाई है। श्रीमद भागवत पुराण में आया है की सत्संग करो। जब आशक्ति संसार के प्रति होती है तो वह बंधन बन जाती है और जब यही आशक्ति भगवान के प्रति हो जाती है तो मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं।
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‘सत्’ का अर्थ है परम सत्य। इसलिए सत्य का संग करना ही सत्संग कहलाता है। यहाँ पर सत्य का अर्थ केवल भगवान से है। क्योंकि वो परम सत्य है। आप यहाँ पर सत्संग का अर्थ पढ़ रहे हैं। ये सत्य है। थोड़ी देर बाद आप अपने काम करेंगे। ये भी सत्य है। लेकिन परम सत्य नही है। क्योंकि परम सत्य वो है जो अब भी यहाँ है।

कल भी था और कल भी रहेगा। इसलिए केवल भगवान ही परम सत्य है। जब आप भगवान के साथ हैं तभी आप सत्संग कर रहे हैं। इसके लिए आपको केवल किसी कथा पंडाल या सत्संग भवन में जाने की जरुरत नही है। या कोई लम्बी चौड़ी दाढ़ी वाले किसी बाबा के पास जाने की जरुरत नही हैं।
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आपके पास समय है तो कथा में जरूर जाइये लेकिन समय नही है तो आप जहाँ पर भी हैं यदि आपको भगवान की याद आ गई तो आप सत्संग में हैं। आप कोई अच्छी पुस्तक पढ़ रहे हैं वो भी सत्संग है। अपने दोस्तों से भगवत चर्चा कर रहे हैं वो भी सत्संग है। सबके कल्याण की आप सोच रहे हैं तो वो भी सत्संग है। यदि आपसे कोई भगवान की कथा पूछना चाहे तो बता दो, ये सत्संग है।

यदि आपको कोई भगवान की कथा, चर्चा सुनाना चाहे तो आप सुन लो ये भी सत्संग है। अगर कोई नही है तो भगवान को ह्रदय से याद कीजिये ये भी सत्संग है। क्योंकि सत्संग से ह्रदय में प्रकाश आ जाता है। और वो प्रकाश भगवान ही हैं। और एक बार ह्रदय में भगवान आ गए तो किसी की भी कमी महसूस नही होगी।
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कृष्ण ने उद्धव से जाते हुए कहा था कि उद्धव मुझे अफसोस है कि मुझे जीवन में अच्छे लोग नहीं मिले। जाते-जाते कह गए यदि कोई भूले से अच्छा आदमी आपके पास आए तो बाहों में भर लेना, दिल में उतार लेना। बड़ा मुश्किल है दुनिया में अच्छे आदमी को ढूंढऩा, नहीं मिलेंगे। आपको ऐसा लगता है कि आपने माता-पिता की सेवा कर ली, सत्संग भी कर लिया लेकिन चिंतन करके आपने जो भी कुछ किया है, रात को सोने से पहले स्वयं से एक बार पूछ लीजिएगा कि आज सबकुछ ठीक रहा।

भगवान कहते हैं – जो लोग सहनशील, दयालु, समस्त देहधारियों के अकारण हितू, किसी के प्रति भी शत्रुभाव न रखनेवाले, शान्त, सरलस्वभाव और सत्पुरुषों का सम्मान करनेवाले होते हैं, जो मुझमें अनन्यभाव से सुदृढ़ प्रेम करते हैं, मेरे लिए सम्पूर्ण कर्म तथा अपने सगे-संबंधियों को भी त्याग देते हैं और मेरे परायण रहकर मेरी पवित्र कथाओं का श्रवण, कीर्तन करते हैं तथा मुझमें ही चित्त लगाए रहते है- उन भक्तों को संसार के तरह-तरह के ताप कोई कष्ट नहीं पहुंचाते हैं।
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ऐसे-ऐसे सर्वसंगपरित्यागी महापुरुष ही साधू होते हैं, तुम्हें उन्ही के संग की इच्छा करनी चाहिए, क्योंकि वे आसक्ति से उत्पन्न सभी दोषों को हर लेनेवाले हैं । सत्पुरुषों के समागम से मेरे पराक्रमों का यथार्थ ज्ञान करानेवाली तथा हृदय और कानों को प्रिय लगनेवाली कथाएँ होती हैं । उनका सेवन करने से शीघ्र ही मोक्षमार्ग में श्रद्धा, प्रेम और भक्ति का क्रमशः विकास होगा।

सत्संग से शांति मिलती है। सत्संग हमे अच्छे बुरे की पहचान बताता है । ‘पुण्य कर्म के प्रभाव से ही इंसान को साधु व संतों का संग व वचन-प्रवचन सुनने को मिलते हैं।mala,japana,108,

सत्संग संत बनाता है। सत्संग राम बनने की प्रेरणा देता है। जबकि कुसंग हमें हराम बनाता है। सत्संग से हमें अपने साधना-पथ पर दृढता से आगे बढने की प्रेरणा मिलती है

* संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ।

कहहिं संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ॥

सत्संग से संबंधित एक लघु दृष्टान्त ,,,,नारद और कृष्ण जी सत्संग महिमा कथा

एक बार देवर्षि नारद भगवान विष्णु के पास गये और प्रणाम करते हुए बोलेः “हे लक्ष्मीपते, हे कमलनयन ! कृपा करके इस दास को सत्संग की महिमा सुनाइये।”

भगवान ने मंद-मंद मुस्कराते हुए अपनी मधुर वाणी में कहाः हे नारद ! सत्संग की महिमा का वर्णन करने में तो वाणी की गति नहीं है।
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” फिर क्षण भर रूककर श्री भगवान बोलेः ” हाँ, यहाँ से तुम आगे जाओ। वहाँ इमली के पेड़ पर एक बड़ा विचित्र, रंगीन गिरगिट है, वह सत्संग की महिमा जानता है। उसी से पूछ लो।”

देवर्षि खुशी-खुशी इमली के पेड़ के पास गये और योगविद्या के बल से गिरगिट से बातें करने लगे। उन्होंने गिरगिट से पूछाः “सत्संग की महिमा क्या है ? कृपया बतलाइये।”

सवाल सुनते ही वह गिरगिट पेड़ से नीचे गिर गया और छटपटाते हुए प्राण छोड़ दिये। नारदजी को बड़ा अचंभा हुआ। वे डरकर लौट आये और भगवान को सारा वृत्तान्त कह सुनाया।
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भगवान ने मुस्कराते हुए कहाः “अच्छा, नगर के उस धनवान के घर जाओ और वहाँ जो तोता पिंजरे में दिखेगा, उसी से सत्संग की महिमा पूछ लेना।”

नारदजी क्षण भर में वहाँ पहुँच गये एवं तोते से वही सवाल पूछा, मगर देवर्षि के देखते ही देखते उसने आँखें मूंद लीं और उसके भी प्राणपखेरू उड़ गये। अब तो नारद जी बड़े घबरा गये।
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वे तुरंत भगवान के पास लौट आये और कहने लगेः “यह क्या लीला है भगवन् ! क्या सत्संग का नाम सुनकर मरना ही सत्संग की महिमा है ?”

श्री भगवान हँसकर बोलेः “वत्स ! इसका मर्म भी तुमको समझ में आ जायेगा। इस बार नगर के राजा के महल में जाओ और उसके नवजात पुत्र से अपना प्रश्न पूछो।”
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नारदजी तो थरथर काँपने लगे और बोलेः “हे प्रभु ! अब तक तो बच गया लेकिन अब की बार तो लगता है मुझे ही मरना पड़ेगा। अगर वह नवजात राजपुत्र मर गया तो राजा मुझे जिंदा नहीं छोड़ेगा।”

भगवान ने नारदजी को अभयदान दिया। नारदजी दिल मुट्ठी में रखकर राजमहल में आये। वहाँ उनका बड़ा सत्कार किया गया। अब तक राजा को कोई संतान नहीं थी। अतः पुत्र के जन्म पर बड़े आनन्दोल्लास से उत्सव मनाया जा रहा था।
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नारदजी ने डरते-डरते राजा से पुत्र के बारे में पूछा। नारदजी को राजपुत्र के पास ले जाया गया। पसीने से तर होते हुए, मन-ही-मन श्रीहरि का नाम लेते हुए नारदजी ने राजपुत्र से सत्संग की महिमा के बारे में प्रश्न किया तो वह नवजात शिशु हँस पड़ा और बोलाः “महाराज ! चंदन को अपनी सुगंध और अमृत को अपने माधुर्य का पता नहीं होता। ऐसे ही आप अपनी महिमा नहीं जानते इसलिए मुझसे पूछ रहे हैं।

वास्तव में आप ही के क्षणमात्र के संग से मैं गिरगिट की योनि से मुक्त हो गया और आप ही के दर्शनमात्र से तोते की क्षुद्र योनि से मुक्त होकर इस मनुष्य जन्म को पा सका।
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आपके सान्निध्यमात्र से मेरी कितनी सारी योनियाँ कट गयीं और मैं सीधे मानव-तन में पहुँच गया, राजपुत्र बना। यह सत्संग का कितना अदभुत प्रभाव है ! हे ऋषिवर ! अब मुझे आशीर्वाद दें कि मैं मनुष्य जन्म के परम लक्ष्य को पा लूँ।”

नारदजी ने खुशी-खुशी आशीर्वाद दिया और भगवान श्री हरि के पास जाकर सब कुछ बता दिया। श्रीहरि बोलेः “सचमुच, सत्संग की बड़ी महिमा है। संत का सही गौरव या तो संत जानते हैं या उनके सच्चे प्रेमी भक्त !” इसलिए जब भी समय मिले सत्संग कीजिये ।

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