सत्संग-माला तथा ज्ञान-मणिमाला-satsang mala tatha manimala pdf download

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सत्य और प्रिय वाणी बोलनी चाहिये, असत्य और प्रिय नहीं,। इसी प्रकार सत्य और अप्रिय भी नहीं बोलना चाहिये। जीव अनेक जन्मों संस्कार के कारण अप्रिय और असत्य बोलता है। वे संस्कार प्रयत्न से हट सकते है, अतः सत्य और अप्रिय बोलने का अभ्यास करना चाहिए। चिन्ता रखकर अभ्यास करना और सत्य एवं प्रिय बोलने में कोई हानि हो जाय तो उसे सह लेना चाहिये। सत्य और प्रिय बोलने की स्थित न हो तो मौन रहना चाहिए और उस मौन में रहने में यदि हानि हो तो उसे सह लेना चाहिये; परंतु सत्य और प्रिय बोलने के नियम का त्याग कभी नहीं करना चाहिए।

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जो इस (सत्य और प्रिय बोलने के) नियमका दृढ़ता से पालन करेगा, उसे सुख, शान्ति, सम्पत्ति प्राप्त होगी, यश मिलेगा और निष्काम भाव से पालन करनेपर मुक्ति मिलेगी। जबतक जीवन रहे, तबतक इस नियमका पालन करना चाहिये। इस नियम में बहुत ही बल है। असत्य बोलनेवाले प्रिय बोलते हैं, इसलिए व्यवहार में प्रिय बोलनेवाले प्रायः कपटी होते हैं, वे स्वार्थसाधन के लिये कपट से प्रिय वाणी बोलते हैं, अतः व्यवहार में प्रिय बोलनेवालों का विश्वास नहीं करना चाहिए। सत्य बोलनेवाले कटु वाणी बोलते हैं और वह कटु वाणी सत्य के तपको खा जाती है। अतएव साधकको सत्य और प्रिय बोलने का सतत प्रयत्न करना चाहिये, इससे भगवान् प्रसन्न होते हैं।

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