बनफ्शा के फायदे और नुकसान | Banafsha ke fayde | health benefits of Banafsha in hindi

बनफ्शा के फायदे और नुकसान -Banafsha ke fayde - health benefits of Banafsha

बनफ्शा के फायदे और नुकसान | Banafsha ke fayde | health benefits of Banafsha in hindi
Banafsha ke fayde

बनफ्शा के फायदे और नुकसान | Banafsha ke fayde | health benefits of Banafsha in hindi

बनफ्शा परिचय :- यह भारत में जम्मू-कश्मीर, उष्णकटिबंधीय पश्चिमी हिमालय में लगभग 1500-1800 मी की ऊँचाई पर तथा अन्य पहाड़ी क्षेत्रों जैसे पश्चिम बंगाल, गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक एवं तमिलनाडू में पाया जाता है। निघण्टु आदि आयुर्वेदीय-ग्रन्थों में इसका विशेष उल्लेख प्राप्त नहीं होता, फिर भी इसके पञ्चाङ्ग विशेषतया पुष्प का प्रयोग औषधि कार्य हेतु किया जाता है। इसके पुष्प पीत, श्वेत, नील, बैंगनी अथवा गुलाबी वर्ण के होते हैं। इसकी मूल कुछ मोटी, टेढ़ी, गांठदार तथा पीली या गुलाबी आभायुक्त होती है। जड़ का स्वाद कषाय तथा चरपरा होता है।

बनफ्शा क्या है (What is Banafsha?)

बनफ्शा और गुल बनफ्शा ईरान से बम्बई होकर या कश्मीर होकर भारतीय बाजारों में आती है जो कश्मीर से आती है उसे कश्मीर बनफशा या बाग बनफ्शा कहते हैं। कश्मीर में भी इसके पौधे होते हैं। पश्चिमी हिमालय पर लगभग पांच हजार फुट की ऊंचाई पर यह बहुतायत से पायी जाती है। अप्रैल से जुलाई तक के समय में इसका संग्रह किया जाता है। बसन्त ऋतु में पुष्पित होने पर इसके पुष्पों का संग्रह करना विशेष गुणप्रद है। लगभग 6 माह बाद इसके पुष्पों का रंग नीलवर्ण से श्वेत वर्ण हो जाता है। तब ये गुणहीन हो जाते हैं। इसके पुष्प ही विशेषतः औषधि कार्य हेतु काम में आते हैं। इनके अभाव में पंचांग लिया जाता है। इसके स्वयं जात पौधे भी होते हैं और इसकी खेती भी की जाती है।

इस वनौषधि का पंचांग बनफ्शा या बनफसा , फूल गुले बनफसाऔर जड़ बीखे बनफ्शः नाम से जानी जाती है। बनफ्शा नाम से इसका सुखाया हुआ पंचांग या गुले बनफ्शा नाम से केवल पुष्प बाजार में औषधि बिक्रेताओं के यहां मिलते हैं । इसका आयात विशेषतः ईरान से होता है और यही असली बनफ्शा है। उत्तरी भारत में इसके स्थान पर इसकी अन्य प्रजातियों का प्रयोग होता है। अथवा इनका संमिश्रण किया जाता है ।

अनेक भाषाओं में बनफ्शा के नाम (Banafsha Called in Different Languages)

  • हिंदी :– वनफ्शा, बाग बनोसा, बनफ्सा;

  • संस्कृत नाम :– वनप्सा, सूक्ष्मपत्रा, नीलपुष्पा, ज्वरापहा;

  • English :– Wild violet (वाइल्ड वॉयलेट) , वॉयलेट टी (Violet tea);

  • Scientific Names :– Viola odorata (वायोला ओडोरेटा)

  • उर्दू- बनफ्शाह (Banafshah);

  • गुजराती- बनफ्सा (Banaphsa);

  • तमिल-बथिलट्ट (Bathilatt), वायीलेट्टू (Vayilettu);

  • नेपाली-घट्टेघांस (Ghattegans);

  • बंगाली-बनोषा (Banosha), बनोसा (Banosa);

  • मराठी-वायीलेट्टु (Vayilettu)

  • अरबी-बनफ साग (Banaf sag);

  • फारसी-वनफ्शाह (Banafshah)

 

बनफ्शा  के द्रव्यगुण

  • रस (taste on tongue):- कटु, तिक्त,

  • गुण (Pharmacological Action): - स्निग्ध

  • वीर्य (Potency): - उष्ण

  • विपाक (transformed state after digestion):- मधुर

बनफ्शा के गुण : Properties of Banafsha

आयुर्वेदीय गुण-कर्म एवं प्रभाव

वनप्सा कटु, तिक्त, उष्ण, लघु, स्निग्ध, वातपित्तशामक, कफनिस्सारक, त्वचा के लिए हितकर, सारक तथा बलकारक होता है।

यह शीत ज्वर, कास तथा श्वास में लाभप्रद है।

इसका प्रकन्द शुष्क प्रतिश्याय, लघु संधियों में उत्पन्न आमवात, ज्वर, त्वक्-विकार, मुख की श्लैष्मिककलाजन्य शोथ, स्नायुविकार, शिरशूल एवं अनिद्रा में लाभप्रद होता है।

इसका पञ्चाङ्ग जूँ-नाशक, जीवाणुरोधी, शोथहर, कवकरोधी, ज्वरघ्न, पूयरोधी, उद्वेष्टरोधी, कासहर, मृदुविरेचक, केंद्रीय तंत्रिकातंत्र अवसादक, वेदनाशामक, शोधक, स्वेदक, मूत्रल, वामक, मृदुकारी, कफनिसारक, निद्राकारक, अल्परक्तदाबकारक तथा पेशी शैथिल्यकर है।

इसकी मूल विरेचक, ज्वरघ्न, बलकारक, कफनिसारक, मूत्रल, शोथहर तथा वामक होती है।

इसके पुष्प मृदुकारी तथा वेदनाशामक होते हैं।

इसके पुष्पों से प्राप्त वाष्पशील तैल सूक्ष्मजीवीनाशक, निद्राकर तथा शामक होता है।

यह कवकरोधी एवं जीवाणुनाशक-क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।:

बनफ्शा से विभिन्न रोगों का सफल उपचार : Banafsha benefits and Uses (labh) in Hindi

  • शिरशूल-5 मिली बनफ्सा पुष्प स्वरस को पिलाने से शिरशूल का शमन होता है।

  • शिरोरोग-वनफ्सा के फूलों को जल के साथ पीसकर शुद्ध तिल तैल में मिलाकर सिद्ध कर लें। इस तैल को बालों पर लगाने से बालों का गिरना बंद हो जाता है तथा छाती पर इस तैल की मालिश करने से श्वास व कास में लाभ होता है।

  • नेत्रविकार-बनफ्सा के पुष्पों को पीसकर सिर पर लेप करने से गर्मी की वजह से होने वाला नेत्रशूल, लालिमा तथा जलन मिटती है।

  • गले की सूजन-5-10 ग्राम वनफ्सा के पुष्पों को 200 मिली पानी में भिगोकर, मसल-छानकर पिलाने से गले की सूजन तथा आमाशय की जलन मिटती है।

  • श्वासनलिका शोथ-2-4 ग्राम वनफ्सा पुष्प चूर्ण को समभाग अदरख स्वरस तथा मधु मिलाकर खाने से प्रतिश्याय (साधारण जुकाम), वक्षीय विकार, श्वासनलिका-शोथ एवं श्वास (दमा) में लाभ होता है।

  • वनफ्सा के पुष्पों का फाण्ट बनाकर 15-20 मिली मात्रा में सेवन करने से जीर्ण श्वासनलिका शोथ, प्रतिश्याय (साधारण जुकाम), कुकुर खाँसी, श्वास एवं अर्धावभेदक (आधासीसी) में लाभ होता है।

  • कास (खांसी)-वनफ्सा के पुष्प चूर्ण का सेवन करने से कास (खांसी), कण्ठ प्रदाह, स्वरभेद एवं बालरोगों में लाभ होता है।

  • प्रतिश्याय-1 गिलास गुनगुने दुग्ध में 1 ग्राम वनफ्सा चूर्ण तथा 500 मिग्रा काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर रात्रि में शयन के पूर्व पीने से प्रतिश्याय में लाभ होता है।

  • वनफ्सा पञ्चाङ्ग (2 ग्राम) में काली मिर्च चूर्ण (2 ग्राम) मिलाकर, अदरक के रस में पीसकर 250 मिग्रा की गोलियां बनाकर प्रात सायं सेवन करने से सर्दी तथा खांसी में लाभ होता है।

  • कफज-विकार-2-4 ग्राम वनफ्सा पुष्प चूर्ण में समभाग मिश्री मिलाकर सेवन करने से कफज विकारों का शमन होता है।

  • उदरशूल (पेट दर्द)-इसके तैल का प्रयोग उदरशूल (पेट दर्द) एवं कास (खांसी) के उपचार के लिए किया जाता है।

  • कोष्ठबद्धता-वनफ्सा के पुष्पों का महीन चूर्ण करके उसमें समभाग खाँड मिलाकर 2-4 ग्राम की मात्रा में गुनगुने जल के साथ सेवन करने से सिरदर्द तथा कोष्ठबद्धता मिटती है।

  • उदरविकार-20 ग्राम वनफ्सा के पुष्पों में 60 ग्राम खांड मिलाकर हाथ से मसलकर 7 दिनों तक धूप में रखने से गुलकन्द तैयार हो जाता है। इस गुलकन्द को प्रतिदिन 2-4 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से उदर तथा आत्र विकारों में लाभ होता है तथा मस्तिष्क का शोधन होता है।

  • रक्तार्श-10-20 मिली वनफ्सा पञ्चाङ्ग क्वाथ में समभाग द्राक्षासव मिलाकर सेवन करने से रक्तार्श में निकलने वाले रक्त का स्तम्भन होता है।

  • विद्रधि-वनफ्सा का क्वाथ बनाकर विद्रधि को धोने से लाभ होता है।

  • अपस्मार-वनफ्सा का क्वाथ बनाकर 10-20 मिली मात्रा में पीने से अपस्मार में लाभ होता है।

  • वनफ्सा के फूलों से सिद्ध तैल का नस्य लेने से अपस्मार में लाभ होता है।

  • ज्वर-समभाग मिश्री, सौंफ, द्राक्षा तथा वनफ्शा का क्वाथ बनाकर 10-20 मिली मात्रा में सेवन करने से ज्वर में लाभ होता है।

  • वनफ्सा क्वाथ में यव का आटा मिलाकर शोथ स्थान पर लगाने से शोथ का शमन होता है।

  • वनफ्शा पुष्पों से निर्मित मधुर सार का प्रयोग बच्चों में कफनिसारक के रूप में किया जाता है, साथ ही यह बच्चों में प्रतिश्याय के कारण उत्पन्न श्वासनलिका क्षोभ को कम करता है।

 

बनफ्शा से निर्मित विशिष्ट योग :

फाण्ट बनफ्शा : बनाने की विधि और इसके फायदे

(क) बनफ्शा पंचांग चूर्ण 50 ग्राम को उबलते हुये 500 मिली पानी में भिगोकर ढककर रख दें आधा घंटे बाद छानकर थोडा थोड़ा सेवन करें। यह स्वेदजनन तथा कफ नि:सारक हैं।

(ख) लगभग 250 मिली. पानी को उबाल कर उसमें 5 ग्राम चूर्ण बनफ्शा पंचांग का चूर्ण डालकर आग से उतार कर रख दें फिर इसे छान कर मिश्री मिलाया हुआ गर्म दूध मिलाकर चाय की भांति घूट-घूट सेवन करें। इससे प्रतिश्याय में लाभ मिलता हैं। यदि रोगी लंघन करे तो अधिक लाभ मिलता है।

(ग) बनफ्शा के पुष्प 200 ग्राम लेकर उन्हें 400 मिली. उबलते हुए पानी में 24 घंटे तक डालकर ढक दें। पश्चात स्वच्छ वस्त्र से छानकर उसमें 400 ग्राम दानेदार शक्कर मिलाकर बोतल में भरकर रख लें। यह फाण्ट गुल बनफ्शा शर्बत बनफ्शा की भांति ही गुणप्रद हैं यह ग्रीष्मकाल में पेट की गरमी, विबन्ध और चर्मरोगों में लाभदायक है। इसे चार-पांच दिनों में ही उपयोग में ले लेना चाहिये।

क्वाथ बनफ्शा : बनाने की विधि और इसके फायदे

गुले बनफ्शा, गावजवां, जूफा, कासनी, मुलहठी, सारिवा, गिलोय, नीम की अंतस्त्वक् (अन्दर की छाल), कुटकी, चिरायता, हरड़ और आमला सबको समान मात्रा में लेकर यथाविधि क्वाथ तैयार कर पिलाने से कफज्वर, जीर्ण प्रतिश्याय, जीर्णज्वर और जीर्ण कास के रोगियों को लाभ मिलता है। क्वाथ में मिलाकर छोटे बच्चों को सेवन कराने से उनका ज्वर, कास, उत्फुल्लिका (डब्बारोग) मिटता है।

अर्क बनफ्शा : बनाने की विधि और इसके फायदे

बनफ्शा को आठगुने गरम जल में रात्रि के समय भिगोकर प्रातः अर्क खींच लेंवे। यह अर्क 25-30 मिली. पिलाना चाहिये।

जीर्णज्वर, आन्त्रिक ज्वर आदि में इसे अन्य औषधियों के साथ अनुपान के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है। इसके पुष्पों का अर्क सन्धिवात एवं कफ विकारों में प्रयुक्त होता है। यह अर्क सुगन्धित एवं स्वादिष्ट होने से मिठाइयों में या अन्य भोज्य पदार्थों में भी डाला जाता है।

शरबते बनफ्शा : बनाने की विधि और इसके फायदे

(क) बनफ्शा के बारीक चूर्ण को आठगुने पानी में रातभर पड़ा रहने दें,प्रातः काल इसका क्वाथ तैयार कर छानकर उसमें दोगुनी या तिगुनी मिश्री डालकर चाशनी बना लें। क्वाथ को अष्टमांश शेष रहने पर ही छानें। यह शर्बत पित्तज्वर में बहुत लाभदायक है। छोटे बच्चों में ज्वर, कास में भी यह उपयोगी है। इसके साथ अन्य औषधि को मिलाकर आसानी से पिलाया जा सकता हैं

(ख) बनफ्शा 20 ग्राम, मुलहठी, मुलहठी 10 ग्राम, तुख्मे खतमी (खतमी के बीज) 70 ग्राम, सपिस्तान (लिसोड़ा) 10 नग , अंजीर 20 नग इन सबका पूर्वोक्त विधि से शर्बत बना लें। यह शरबत कास, रक्तपित्त, गले के रोग, ज्वर आदि में लाभप्रद है।

केवल बनफ्शा पुष्पों का भी शर्बत तैयार किया जा सकता है। यह शरबत रंग, स्वाद और सुगन्ध में मनोहर होता है। यह बच्चों को अधिक प्रिय होता है। यह नेत्र रोग, प्रतिश्याय, उष्णवात, ज्वर, अतिसार, दाह आदि में अधिक हितकारक होता है।

गुलकन्द बनफ्शा : बनाने की विधि और इसके फायदे

इसके ताजा पुष्प 200 ग्राम को 600 ग्राम शक्कर में या मिश्री के चूर्ण के साथ अच्छी तरह हाथ से मसल कर सात दिनों तक धूप में रखें। इस तैयार गुलकन्द की मात्रा 10-20 ग्राम है। इसके प्रयोग से मस्तिष्क का तथा आंतों का शोधन होता है।

 

बनफ्शा का पौधा कैसा होता है ? :

बनफ्शा का प्रायः काण्डविहीन (तना रहित) छोटा पौधा होता है। इसका मूल दृढ़ होता है। यह मूल फीके पीले रंग का टेढ़ा -मेढ़ा होता है।

बनफ्शा के पत्ते बनफ्शा के पत्ते रोमश, हृदयाकृति के होते हैं जो ब्राह्मी किंवा मण्डूकपर्णी के पत्रों के समान होते हैं। अत: कई लोग इसे ब्राह्मी या मण्डूकपर्णी का एक भेद मानते हैं।

बनफ्शा के फूल (पुष्प) बनफ्शा के फूल नीले बैंगनी रंग के सुगन्धित होते हैं। पुष्पों की पंखड़ियों का गोल निम्न भाग ही इसका बीज कोष है।

बनफ्शा के प्रकार :

बनफ्शा की अन्य प्रजातियों में मुख्य है

बायोला सांइनेरिया (Viola Cineria Bioss) और बायोला सर्पेन्स (Viola Serpens pilosa blume)।

बनफ्शा का रासायनिक विश्लेषण : Banafsha Chemical Constituents

बनफ्शा के पुष्पों में बायोलिन नामक कटु तिक्त वामक द्रव्य पाया जाता हैं इसके अतिरिक्त रुटिन सायनिन आदि भी होते हैं। पत्र में एक सुगन्धित तैल, क्षाराभ, रंजक द्रव्य आदि होते हैं। पुष्पों में भी एक उड़नशील तैल पाया जाता है। मूल में सेपोनिन नामक तत्व एक सुगन्धित तैल आदि होते हैं।

बनफ्शा का उपयोगी भाग : Useful Parts of Banafsha in Hindi

फूल ,पत्ते ,फल और जड़

बनफ्शा के सेवन की मात्रा (How Much to Consume Banafsha?)

क्वाथ 10-30 मिली। फाण्ट 15-20 मिली या चिकित्सक के परामर्शानुसार।

बनफ्शा के नुकसान :Side Effects of Banafsha

वनफ्सा का अत्यधिक मात्रा में प्रयोग करने पर बेचैनी होती है तथा उलटी आने लगती है।

गर्भवती को इसका सेवन नहीं कराना चाहिये। यदि आवश्यकता हो तो पुष्पों का शर्बत पिलाया जा सकता है।

बनफ्शा कहाँ पे पाया या उगाया जाता है (Where is Banafsha Found or Grown?)

यह भारत में जम्मू-कश्मीर, उष्णकटिबंधीय पश्चिमी हिमालय में लगभग 1500-1800 मी की ऊँचाई पर तथा अन्य पहाड़ी क्षेत्रों जैसे पश्चिम बंगाल, गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक एवं तमिलनाडू में पाया जाता है।

ध्यान दें :- Dcgyan.com के इस लेख (आर्टिकल) में आपको बनफ्शा के फायदे, प्रयोग, खुराक और नुकसान के विषय में जानकारी दी गई है,यह केवल जानकारी मात्र है | किसी व्यक्ति विशेष के उपयोग करने से पहले चिकित्सक से परामर्श करना आवश्यक है |