संत श्री नरसी मेहता महाराज जी की चरितावली | Biography of Narsinh Mehta

संत श्री नरसी मेहता  महाराज जी की चरितावली | Biography of Narsinh Mehta

नरसी मेहता अथवा नरसिंह मेहता  गुजराती भक्ति साहित्य के श्रेष्ठतम कवि थे। उनके कृतित्व और व्यक्तित्व की महत्ता के अनुरूप साहित्य के इतिहास ग्रंथों में “नरसिंह-मीरा-युग” नाम से एक स्वतंत्र काव्य काल का निर्धारण किया गया है, जिसकी मुख्य विशेषता भावप्रवण कृष्ण की भक्ति से अनुप्रेरित पदों का निर्माण है। पदप्रणेता के रूप में गुजराती साहित्य में नरसी का लगभग वही स्थान है जो हिन्दी में महाकवि सूरदास का है।

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नरसी मेहता का जन्म जूनागढ़ के समीपवर्ती “तलाजा” नामक ग्राम में हुआ था और उनके पिता कृष्णदामोदर वडनगर के नागरवंशी कुलीन ब्राह्मण थे। उनका अवसान हो जाने पर बाल्यकाल से ही नरसी को कष्टमय जीवन व्यतीत करना पड़ा। एक कथा के अनुसार वे आठ वर्ष तक गूंगे रहे और किसी कृष्णभक्त साधु की कृपा से उन्हें वाणी का वरदान प्राप्त हुआ। साधु संग उनका व्यसन था। उद्यमहीनता के कारण उन्हें भाभी की कटूक्तियाँ सहनी पड़तीं और अंतत: गृहत्याग भी करना पड़ा। विवाहोपरांत पत्नी माणिकबाई से कुँवर बाई तथा शामलदास नामक दो संतानें हुई। कृष्णभक्त होने से पूर्व उनके शैव होने के प्रमाण मिलते हैं। कहा जाता है, “गोपीनाथ” महादेव की कृपा से ही उन्हें कृष्णलीला का दर्शन हुआ जिसने उने जीवन को सर्वथा नई दिशा में मोड़ दिया। गृहस्थ जीवन में चमत्कारिक रूप से अपने आराध्य की ओर से सहायता प्राप्त होने के अनेक वर्णन उनकी आत्मचरितपरक कई रचनाओं में उपलब्ध होते हैं।

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नरसिंहराम बचपन से ही गूँगे थे. आठ वर्ष की आयु में एक दिन इनकी दादी जय कुँवरि इन्हें एक दिन मंदिर ले गयी वहाँ एक संत थे जिन्होंने इनके कान में कहा – राधे कृष्ण, राधे कृष्ण, बस फिर क्या था ये राधे कृष्ण, राधे कृष्ण कहने लगे !

प्रसंग 1.- इनके माता पिता तो थे नहीं केवल एक बड़े भाई और भाभी थी,पत्नि माणिकगौरी और दो बच्चे पुत्री कुँवरबाई और पुत्र शामलदास थे.केवल भगवान का भजन करना ही इनकी दिनचर्या थी .एक बार उनकी भाभी ने उन्हे घर से निकल दिया तो वे जंगल में एक शिव मंदिर में रोते रहे उन्हे वहाँ बैठे सात दिन हो गये उन्होंने अन्न-जल तक नहीं पिया तब भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने वर मागने के लिये कहा..

तो इन्होने कहा -कि आपको जो वस्तु अतिप्रिये हो वह दीजिएगा.उन्होंने कहा मुझे तो कृष्ण ही अति प्रिये है शिव ने इन्हें दिव्य देह देकर श्री कृष्ण जी की रास लीला में ले गये वहाँ जब रास शुरू हुआ तो भगवान ने इनके हाथ में दीपक देकर रास के बीच में खड़ा कर दिया ये रास में इतना खो गये की दीपक से इनका हाथ जलने लगा पर इन्हे पता तक नही चला अंत में जब रास खत्म हुआ तो भगवान ने ही आग बुझायी.ये देखकर रुक्मणि आदि रानियो को बड़ा आश्चर्य हुआ.

प्रसंग 2.- जब इनकी बेटी की शादी हुई तो भगवान स्वयं सारा दहेज लेकर रुक्मणी जी के साथ आये और बेटी को विदा कराया. और जब बेटे की शादी हुई तो भगवान इनके मित्र बनकर हाथी,घोडा,पैदल चतुरंगिणी सेना के साथ आये और धूमधाम से विवाह सम्पन्न कराया.उस समय ऐसा लगता था मानो स्वयं द्वारकाधीश की ही बारात हो. 

प्रसंग 3.- एक बार जब इन्हें पित्ता का श्राद्ध करना था तो इन्होने एक-दो जाति वालो को निमंत्रण दिया तो जातिवालो ने कहा- कि सारी जात के लोग आयेगे. ये सभी का निमंत्रण कर आये पर घर में तो खुद के खाने का ही ठिकाना ना था. पत्नि के गहने बेचकर सारा सामान तो ला दिया पर घी बाकि था ये बाजार से लेने गये पर व्यापारी ने बिना पैसे के देने से मना कर दिया. ये एक व्यक्ति के पास गये उसने कहा- कि आप भजन सुना दीजिये फिर में आप को घी दे दूँगा,ये भजन करने बैठ गये.

यहाँ जब बहुत देर हो गयी तो भगवान ने भक्तराज नरसिंह का रूप रखा और एक बैलगाड़ी में सारा सामान भरकर घर पँहुच गये.और सारे जाति वालो को अपने अनुचरो से बुलवाया और अत्यत प्रेम से भोजन करा दिया इस प्रकार संध्या समय तक भक्तराज का सारा काम समाप्त कर अपने अनुचर के साथ भगवान अंर्तध्यान हो गये.

थोड़ी देर बाद भक्तराज हाथ में घी का पात्र लेकर आये श्राद्ध न करने के कारण वे बड़े संकुचित थे. पत्नि ने कहा – स्वामी ब्राह्मण भोजन समाप्त करके आप ये क्या ला रहे है.

वे कहने लगे – अरे! ये तुम क्या कह रही हो ब्राह्मण भोज और श्राद्ध हो गया? में तो प्रातःकाल ही घी लेने गया सों अभी आ रहा हूँ. रास्ते में एक सज्जन के यहाँ भजन करने बैठा गया था इसलिये मुझे आने में देर हो गयी तो फिर विधिवत  श्राद्ध करके हजारों मनुष्यो को भोजन किसने कराया पत्नि ने कहा – मेने स्पष्ट देखा है आप ने ही सब कुछ किया है क्यों मजाक कर रहे हो.तब वे दोनों समझ गये की ये सब मेरे श्री कृष्ण का कार्य है .और वे प्रसन्न होकर प्रेम मगन होकर भगवदभजन करने लगे.

प्रसंग 4.- एक दिन इनके पास एक व्यक्ति आया इनसे कहने लगा – भक्तराज में गरीब हूँ अपनी बेटी का कन्यादान करने में असमर्थ हूँ, यदि आप मुझे साठ रुपये की सहायता करे तो आपका कल्याण होगा.

भक्तराज ने कहा – मेरे पास तो रुपये है नहीं परन्तु थोडी देर बैठिये में कोशिश करता हूँ,भक्तराज ब्राहाण को बैठाकर बाजार गये परन्तु किसी ने भी रुपये नहीं दिये वे एक धरणीधर नामक व्यक्ति के पास आये.धरणीधर एक भक्त आदमी था और नरसिंहराम पर उसकी कुछ श्रद्धा भी थी परन्तु वह बड़ा स्पष्टवादी था भक्तराज ने सारा हाल सुनाया तो वे कहने लगे की कोई वस्तु गिरवी रखनी पड़ेगी तभी में पैसे दूँगा भक्तराज ने सोचा की वस्तु तो मेरे पास कुछ है नहीं,

एक क्षण सोचकर उन्होंने कहा – धरणीधर मेरे पास गिरवी रखने के लिये कोई दूसरी वस्तु तो है नहीं,यदि आपको विश्वास हो तो में “केदारराग” आपके पास रख सकता हूँ. जब तक आपके रुपये ना लौटा दूँ तब तक चाहे प्राण भी चले जाये में केदार राग नहीं गाऊँगा.धरणीधर को मालूम था केदारराग भक्तराज के लिये कितनी आवश्यक है अतएव वह तैयार हो गया भक्तराज ने प्रतिज्ञा पत्र दे दिया – कि में भगवान को साक्षी देकर कहता हूँ कि जब तक धरणीधरजी को साठ रुपये चुका ना दूँ तब तक केदारराग नहीं गाऊँगा. इस तरह ब्राहाण पैसे लेकर विदा हुए.

जब इनकी भक्ति बढी तो इनसे जलने वालो ने राजा से झूठी शिकायत की कि ये नरसिंह अनाचार फैला रहा है. भक्ति का ढो़ग करता है, तब एक दिन राजा ने उन्हे दरबार में बुलाया, और सोचा कि पूर्ण परीक्षा किये बिना भक्तराज को दोषी या निर्दोष कुछ भी कहना न्यायविरुध है. तब एक मार्ग उन्हे सूझा उन्होंने एक हार मगाया और उसे भक्तराज के हाथ में दिया और कहा – आप ये हार भगवान के गले में समर्पित कर दीजिए, में स्वयं मंदिर का ताला बंद कर दूँगा. यदि कल प्रातःकाल होने के पहले स्वयं भगवान प्रकट होकर यही हार आपके गले में डाल दे तो आपकी निर्दोषता सिद्ध हो जायेगे, नहीं तो आपकी गर्दन काट दी जायेगी.

भक्तराज मंदिर के चौक में बैठ गये,और बड़े विश्वास से भजन करने लगे, पंरतु रह-रहकर उनके ह्रदय में ये बात खटक रही थी कि मेरा प्रिय राग तो साठ रुपये में बंधक पड़ा है, उसके बिना में भगवान का आवाहन कैसे करुँगा. उन्होंने भगवान का ध्यान करने कि बहुत चेष्ठा कि परन्तु इस बात के लिये उनका चित विहल हो उठता था.

वैकुण्ठ धाम में भगवान श्री कृष्ण सों रहे थे और लक्ष्मीजी उनके पैर दबा रही थे आधी रात के समय भगवान एकाएक जाग उठे और अत्यंत शीघता से चल पड़े भक्तवत्सल भगवान ने आज साथ में गरुड़ या किसी पार्षद को भी लेने कि जरुरत भी नहीं समझी उन्होंने तुरंत भक्तराज का रूप रखा और धरणीधर का दरवाजा खटखटाया.

धरणीधर ने कहा- कौन है !

भगवान ने कहा – में नरसिंह हूँ ऋणमुक्त होने के लिये आया हूँ. धरणीधर ने द्वार खोले तो नरसिंह रूप रखे भगवान ने कहा कि आपको कष्ट दिया, परन्तु मुझे केदारराग की जरुरत है, ये पैसे लीजिये, और प्रतिज्ञा पत्र पर भरपाई लिखकर मुझे दीजियेगा. उसने भगवान को पत्र दे दिया. प्रतिज्ञा पत्र लेकर भगवान राजमहल में पहुँच गये. भगबान ने आकाश से उस पत्र को भक्तराज के सामने गिरा दिया, भक्तराज ने सामने गिरते देखा, तो कौतूहलवश उठा लिया, उन्हे बड़ा आश्चर्य हुआ कि ये तो मेरा प्रतिज्ञा पत्र है उन्होंने उस पर लिखे नवीन अक्षर को पढ़ा, उसमे लिखा था आज आधी रात को जगाकर नरसिंहराम जी ने मेरे पूरे साठ रुपये चुका दिये अतएव मेने भरपाई लिख दी है,अब वह केदारराग प्रेम से गा सकता है – धरणीधर राय ’ .

पत्र पढ़ते-पढते भक्तराज की आँखो से प्रेमाअश्रू छलक पड़े, वे प्रेम से उन्मक्त होकर नाचने लगे. भगवान के हृदय में मुझ जैसे जीव के लिये भी स्थान है, इस विचार ने उन्हे पागल बना दिया, वे बेसुध होकर नृत्य,और भजन करने लगे.

उन्हें ये भी स्मरण नहीं था कि अब प्रातःकाल में कुछ क्षण ही शेष रह गये है उन्होंने अपनी करताल सँभाली और प्रेमपूर्वक केदारराग गाने लगे जैसे ही सूर्य उदय हुआ राजभवन के मंदिर के द्वार की लोहे की मजबूत जंजीर और ताला टूटकर जमींन पर गिर गया, और दरवाजा अपने आप खुल गया और एक दिव्य ज्योति मंदिर से निकलकर भक्तराज की ओर चलने लगी सभी आँखे फाड़फाड़कर यह दृश्य देखने लगे. भगवान ने सबके देखते-देखते अपने गले का हार उतारकर भक्तराज के गले में पहना दी. भक्तराज जोर-जोर से कहने लगे श्री कृष्ण भगवान की जय अंत में सभी ने भक्तराज से क्षमा माँगी,आगे उन्होंने पाँच वर्ष तक और रहकर भक्ति का प्रचार किया.

“ जय जय श्री राधे ”

 
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