संत श्री सूरदास जी महाराज जी की चरितावली | Biography of Sant Surdas Ji

संत श्री सूरदास जी महाराज जी की चरितावली | Biography of Sant Surdas Ji

भक्तों भक्त के चरित्र की महिमा अनंन्त है भक्तों का चरित्र पढ़ने सुनने से भक्ति बढ़ती है और प्रभु में प्रीती बढ़ती है | भक्त चरित्र हो या संत चरित्र संत के मुखारविंद से सुनने से बहुत ही अध्यात्मक लाभ प्राप्त होता है | यहाँ परम पूज्य संत प्रवर श्री स्वामी देवादास जी महाराज द्वारा परम संत भक्त संत सूरदास जीका चरित्र प्रस्तुत है |

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प्रवचनामृत (Audio By) :

परम पूज्य संत प्रवर श्री स्वामी देवादास जी महाराज ।

भक्ति आश्रम ,दावानल कुंड,वृन्दावन मथुरा (उत्तर प्रदेश )

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कृष्ण भक्ति की अजस्र धारा को प्रवाहित करने वाले भक्त कवियों में सूरदास का नाम सर्वोपरि है. हिन्दी साहित्य में भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य उपासक और ब्रज भाषा के श्रेष्ठ कवि महात्मा सूरदास हिंदी साहित्य के सूर्य माने जाते हैं.

जीवन परिचय – सूरदास का जन्म 1478 ईस्वी में रुनकता नामक गांव में हुआ. यह गाँव मथुरा-आगरा मार्ग के किनारे स्थित है. कुछ विद्वानों का मत है कि सूर का जन्म सीही नामक ग्राम में एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था. बाद में ये आगरा और मथुरा के बीच गऊघाट पर आकर रहने लगे थे. सूरदास के पिता रामदास गायक थे.

सूरदास के जन्मांध होने के विषय में मतभेद है. प्रारंभ में सूरदास आगरा के समीप गऊघाट पर रहते थे. वहीं उनकी भेंट श्री वल्लभाचार्य से हुई और वे उनके शिष्य बन गए. वल्लभाचार्य ने उनको पुष्टिमार्ग में दीक्षित कर के कृष्णलीला के पद गाने का आदेश दिया. सूरदास जी द्वारा लिखित पाँच ग्रन्थ बताए जाते हैं –

1. सूरसागर – जो सूरदास की प्रसिद्ध रचना है. जिसमें सवा लाख पद संग्रहित थे. किंतु अब सात-आठ हजार पद ही मिलते हैं.

2. सूरसारावली

3. साहित्य लहरी – जिसमें उनके कूट पद संकलित हैं.

4. नल-दमयन्ती

5. ब्याहलो

जब सूरदास जी भगवल्लीला के पद गाने लगे

प्रसंग 1. – बात उस समय की है, जब संत सूरदास जी पद रचने लगे थे. अपने पद वे बड़े ही भावपूर्ण ढंग से लय में गाया करते थे. पर तब उनके पदों में दीन-हीन प्रेमी की याचना भरी होती थी. वे स्वयं को पतितों का सरताज कहते थे और आत्मग्लानि से भरे पद गाते थे.एक बार एक सभा में उन्होंने ऐसे ही भावों से युक्त पद गाए पदों की पंक्तियाँ थीं:-

‘हरि हौं (मैं) सब पतितन को नायक!’

अर्थात् ” हे प्रभु! मैं तो सब पतितों का नायक – यानी सबसे बड़ा पापी हूं.”

सौभाग्य से उस दिन उस सभा में वल्लभाचार्य जी भी उपस्थित थे. जब उन्होंने सूरदास जी के ये पद सुने, तो उन्हें झिड़कते हुए बोले, जो सूर हैं तें ऐसो घिघियात काहे को हैं, कछु भगवल्लीला वर्णन करि.

अर्थात: सूरदास, तुम्हारा तो नाम सूर (शूर, वीर पुरुष) है, फिर तुम यूँ घिघियाते या किलसते से क्यों रहते हो?तुम्हारे पद इतनी दीनता से क्यों भरे हुए हैं?अरे कुछ भगवान की लीला के इन्द्रधनुषी रंगों में रंगे पद रचो.

सूरदास जी मायूसी ओढ़कर बोले, – असमर्थ हूं नाथ, भला मुझ जैसा दीन-हीन नेत्रहीन क्या भगवद्लीला के पद रचेगा?

तब श्री वल्लभाचार्य जी ने उन्हें परम उपदेश दिया.उसे पाते ही सूरदास जी में दिव्य दृष्टि का स्फुरण हो गया. उन्हें नंद नंदन के बालरूप का प्रत्यक्ष साक्षात्कार होने लगा.कभी उन्हें नन्हें नटवर नागर पैंजनी या किंगनी को छमछम करके घुटनों के बल दौड़ते दीखते, तो कभी अपनी दूध की दंतियां दिखा किलकते हुए.

उनकी मनोहारी छवि कोटि-कोटि छटा लिए सूर के हृदयाकाश में कभी उभरती, कभी ओझल हो जाती. सूरदास जी प्रभु के इस लीलावत खेल से हमेशा अघाए-हर्षाए रहते.

अब वे प्रेम पगे हृदय से अपने पद रचते और गाते. इन पदों में बाल गोविंद के रूप के चित्रण इतने सटीक होते कि आँखों वाले बड़े-बड़े ज्ञानी आश्चर्यचकित हो उठते.

प्रसंग 2- एक बार श्री विट्टलनाथ जी के गुणी सूत्रों ने सूरदास जी से ठिठोली करनी चाही. उन्होंने नन्हे कन्हाई की एक मूरत ली.उसे न पीताम्बर पहनाया, न आभूषण,मात्र एक सच्चे मोतियों की माला गले में पहनाकर उसे सूरदास जी के समक्ष रख दिया.

फिर उनसे मसखरी करते हुए बोले, – सूरदास जी! सामने धरी श्याममूर्ति के रूप माधुर्य पर कछु कीर्तन हो जावे.सूरदास जी ने तुरंत खड़ताल खड़का दिए और गाया :-

देखे री हरि नंगम नंगा.

जल सुत (मोतियन) भूषण अंग विराजत

बसनहीन छवि उठत तरंगा.

सूरदास जी ने नन्हे कन्हाई को नंग-धड़ंग घोषित कर दिया-बिना किसी झिझक, कोताही या अस्पष्टता के. और इस स्वरूप का भी ऐसा चित्र उकेरा, जैसा एक माँ अपने लाल को स्नान कराते देखती है.

परन्तु सूरदास अपने द्वारा किए गए प्रभु रूप के चित्रण से स्वयं कभी संतुष्ट नहीं हुए.इसे एक भक्त का विनय भाव समझें या एक समर्पित हृदय का अनंत असंतोष. कुछ भी समझें, पर सूरदास जी में एक ही कसक रह-रह कर छलांग मारती थी:-

जो मेरी अँखियनि रसना होती कहतीं रूप.बनाई री.

चिर जीवहु जसुदा कौ ढोटा, सूरदास बलि जाई री..

यदि मेरी आँखों में वाणी होती, तब तो कुछ बात बनती. तभी मैं तुम्हें ठीक-ठीक बता पता. पर यहाँ तो दृष्टि के पास शब्द नहीं हैं और जिह्वा के पास दृष्टि नहीं है.

सूरदास जी के स्थूल नेत्रों में ज्योति नहीं! परन्तु हृदय में ऐसा प्रकाश कि सबको भक्ति की राह दिखाई ! देह दुर्बल, शुष्क, रूखी-सूखी सी! पर हृदय में उमड़ता-घुमड़ता, रस से सराबोर प्रेम का ऐसा मेघ जो जीवन भर बरसता रहा.जिन्होंने भक्ति में वात्सल्य रस का नया स्वाद घोला था.इनसे पूर्व शायद ही किसी ने प्रभु को (प्रभु न मानकर) नटखट दुलारे के रूप में इस कदर लाड़ किया होगा.

सोच कर देखिए, कितना मधुर नाता है- प्रभु गंभीर परम-पिता नहीं, हमारी गोद में किलकारियाँ करता एक प्यारा-सा बालक है.एक गोल-मटोल बटुक है, जिसकी मासूम अदाओं को देखकर हम स्वयं बच्चे बन बैठें.जिसे बोलना सिखाते-सिखाते, हम स्वयं तुतलाने लगें.

मृत्यु :

   सूरदास की मृत्यु (तिरोभाव) गोवर्धन के निकट पारसौली ग्राम में 1580 ईस्वी में हुआ.सूरदास का जीवन काल “वर्ष 1478 से वर्ष 1580 तक” यानी कुल 102 वर्ष का रहा था। अपने दिर्ध आयु जीवन काल में सूरदास ने कई ग्रंथ लिखे और काव्य पद की रचना की। सूरदास का जीवन कृष्ण भक्ति के लिए समर्पित था।

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