चालमोगरा  के फायदे और नुकसान | Chaulmoogra ke fayde | health benefits of Chaulmoogra in hindi

चालमोगरा  के फायदे और नुकसान | Chaulmoogra ke fayde | health benefits of Chaulmoogra in hindi

chalmogra चालमोगरा  परिचय :-

तुवरक को चालमोगरा के नाम से भी जानते हैं। चालमोगरा (तुवरक) एक औषधि है जिसके फायदे (CHALMOGRA KE FAYDE) घाव को ठीक करने, उल्टी को रोकने, कुष्ठ रोग को ठीक करने में मिलते हैं। इसके साथ ही आप खुजली, गले के रोग, डायबिटीज, सूजन सहित खांसी और सांसों के रोग में भी तुवरक से लाभ ले सकते हैं। कुष्ठ रोग और आंखों की बीमारी में तुवरक के फायदे मिलते हैं। मुख्यतः त्वचा रोग में  तुवरक का इस्तेमाल किया जाता है। चालमोगरा (तुवरक) का तेल कुष्ठ रोग का इलाज करता है। आजकल इंजेक्शन द्वारा भी तुवरक (चालमोगरा) का प्रयोग किया जाता है।

चालमोगरा  क्या है (What is Chaulmoogra?)

तुवरक के वृक्ष लगभग 15-30 मीटर ऊँचे, सदाहरित, मध्यम आकार के होते हैं। इसकी शाखाएँ लगभग गोलाकार, रोमश होती हैं। इसके तने की छाल भूरे रंग की और खुरदरी तथा सफेद रंग की होती है जो दरारयुक्त होती है। इसके पत्ते सरल, एकांतर 10-22 सेमी लम्बे एवं 3-10 सेमी चौड़े, चर्मिल तथा गहरे हरे रंग के होते हैं।

इसके फूल छोटे, हरे सफेद, एकलिंगी होते है। इसके फल 5-10 सेमी व्यास के, सेब के जैसे, अण्डाकार, गोलाकार तथा सरस फल होते हैं। फल के भीतर के सफेद गूदे के बीच में 15-20 पीताभ, बादाम जैसे बीज होते है। तुवरक के वृक्ष में फूल और फल अगस्त से मार्च तक होता है।

अनेक भाषाओं में चालमोगरा  के नाम (Chaulmoogra Called in Different Languages)

  • हिंदी :– चालमोगरा,तुवरक

  • संस्कृत नाम :– गरुड़फल, तुवरक, कटुकपित्थ, कुष्ठवैरी

  • English :– मरोठी ट्री (Morothi Tree), चालमोगरा (Chalmoogra)

  • Scientific Names :– हिड्नोकार्पस लॉरीफोलिआ Hydnocarpus laurifolia (Dennst.) और यह Flacourtiaceae (फ्लेकौरशिएसी) कुल का है।

  • Persian :- विरमोगरा (Virmogara), Jungali almond (जंगली आलमन्ड)

  • Marathi :- कटुकवथ (Katukavath)

  • Kannada :- गरूड़फल (Garudphal), सुंती (Suranti)

  • Gujarati :- गुंवाडीयो (Guvandiyo)

  • Tamil :- मरावेट्टई (Maravettai), निरादि मुट्टु (Niradi muttu)

  • Telugu :- आदि-बदामु (Adi-badamu)

  • Bengali :- चौलमुगरा (Chaulmugra)

  • Nepali :- तुवरक (Tuvrak)

  • Malayalam :- कोटी (Koti), मारा वेट्टी (Mara vetti)

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चालमोगरा  के द्रव्यगुण

  • रस (taste on tongue):- कटु, तिक्त, कषाय।

  • गुण (Pharmacological Action): तीक्ष्ण, स्निग्ध ।

  • वीर्य (Potency): उष्ण ।

  • विपाक (transformed state after digestion):- कटु ।

रासायनिक संघटन :-

बीजों से प्राप्त तेल 44 प्रतिशत होता है जिसमें चालमोगरिक एसिड 26.6 प्रतिशत, हिडनोकार्पिक एसिड 48.6 प्रतिशत, पामिटिक एसिड, स्नेहाम्ल, ग्लिसराइड्स होते हैं।

परीक्षा परखनली में तुवरक तेलको लेकर गन्धक का तेजाब 1 मि.ली. डालने पर रंग भूरा लाल हो जाता है। बाद में यह भूरे रंग का हो जाता है। यदि ऐसा नहीं होता है तो तेलकी शुद्धता में सन्देह करना चाहिये।

चालमोगरा  से विभिन्न रोगों का सफल उपचार : Chaulmoogra benefits and Uses (labh) in Hindi

डायबिटीज में फायदेमंद तुवरक का सेवन (Turavak Benefits in Controlling Diabetes in Hindi)

  • 1-2 ग्राम तुवरक बीज चूर्ण को दिन में 2-3 बार जल के साथ सेवन करने से डायबिटीज (मधुमेह) में लाभ (tuvrak ke fayde) होता है।

  • एक चम्मच फल-गिरी चूर्ण को दिन में तीन बार खाने से पेशाब से शक्कर जाना कम होता है। जब मूत्र में शक्कर जाना बंद हो जाय तो प्रयोग बंद कर दें।

योनि के दुर्गंध आने की समस्या में चालमोगरा के फायदे (Chaulmoogra Benefits in Vagina Orour Problem in Hindi)

  • तुवरक काढ़ा से योनि का धोएं। इससे योनि से दुर्गंध आने की समस्या ठीक होती है।

  • चालमोगरा (chalmugra) के पेस्ट की बत्ती बना लें। इसे योनि के अन्दर रखें। इससे भी योनि का दुर्गंध दूर होता है।

सिफलिस रोग में चालमोगरा के फायदे (Benefits of Chaulmoogra in Syphilis Disease in Hindi)

  • चालमोगरा (chalmugra) के बीजों के साथ जंगली मूंग को मिलाकर कूट लें। इसे भांगरा के रस की 3 दिन भावना देकर चौथे दिन महीन पीस लें। इसमें थोड़ा चन्दन तेल या नारियल तेल या आँवला तेल मिला लें। इसका उबटन बनाकर सिफलिस के घाव पर लगाएं। इसके बाद 3-4 घंटे बाद स्नान (chalmogra ke fayde) करें।

  • पूरे शरीर में फैले हुए सिफलिस के रोग और गठिया के पुराने रोग में चालमोगरा तेल की 5-6 बूंद सेवन करना शुरू करें। बाद में तुवरक तेल के सेवन की मात्रा बढ़ाते हुए 60 बूंद तक करें। इससे सिफलिस (उपदंश) रोग में लाभ होता है। जब तक इस औषधि का सेवन करें तब तक मिर्च, मसाले, खटाई से परहेज रखें। दूध घी और मक्खन का अधिक सेवन करें।

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गठिया रोग में चालमोगरा के फायदे (Chaulmoogra Benefits in Treating Gout Disease in Hindi)

1 ग्राम चालमोगरा (chalmugra) बीज चूर्ण को दिन में तीन बार सेवन करने से गठिया में आराम मिलता है।

कुष्ठ रोग में तुवरक के औषधयी गुण से लाभ (Chaulmoogra Oil Benefits for Leprosy Treatment in Hindi)

  • कुष्ठ रोग का इलाज करने के लिए चालमोगरा तेल का सेवन पहले 10 बूंद करना चाहिए। इससे उल्टी होकर शरीर के सब गंदगी बाहर आ जाती है। इसके बाद तुवरक के तेल के 5-6 बूंदों को कैप्सूल में डालकर या दूध व मक्खन के साथ भोजन के बाद सुबह और शाम सेवन करें। धीरे-धीरे मात्रा बढ़ाकर 60 बूंदें तक ले जायें। इस तेल को नीम के तेल में मिलाकर शरीर के बाहरी अंगों पर लेप करें। कुष्ठ रोग की शुरुआती अवस्था में इस औषधि का सेवन करें। इस दौरान खटाई मिर्च मसाले नहीं खाएं।

  • तुबरक (tubrak) बीज, भल्लातक बीज, बाकुची मूल, चित्रकमूल अथवा शिलाजीत का लंबे समय तक सेवन करने से कुष्ठ रोग में लाभ हाता है।

  • चालमोगरा तेल को लगाने से महाकुष्ठ, खुजली और अन्य चर्मरोगों में लाभ (chalmogra ke fayde) होता है।

घाव में चालमोगरा के औषधीय गुण से लाभ (Benefits of Chaulmoogra Oil in Healing Wound in Hindi)

  • तुबरक के बीजों को खूब महीन पीसकर बारीक चूर्ण बना लें। इसे घाव पर लगाने से घाव से निकलने वाला खून बंद हो जाता है। घाव तुरंत भर जाता है।

  • चालमोगरा बीज को पीसकर लगाने से घाव ठीक होता है।

दादखाजखुजली में चालमोगरा के औषधीय गुण से फायदा (Benefits of Chaulmoogra Oil in Itching in Hindi)

  • तुवरक (chalmugra) में निम्ब तेल या मक्खन मिलाकर दाद में मालिश करने से एक महीने में दाद ठीक हो जाता है। इसके लिए 10 मिली तेल को 50 ग्राम वैसलीन में मिलाकर रख लें। इसका प्रयोग करते रहें।

  • चालमोगरा (chalmugra) के तेल को एरण्ड तेल में मिला लें। इसमें गंधक, कपूर और नींबू का रस मिलाकर लगाएं। इससे खाज तथा खुजली रोग में लाभ होता है।

  • तुवरक के बीजों को छिल्के सहित पीसकर एरंड तेल में मिला लें। इसे खुजली पर लेप करने से खुजली की बीमारी ठीक होती है।

  • चालमोगरा के बीजों को गोमूत्र में पीसकर दिन में 2-3 बार लेप करने से खुजली में लाभ होता है।

  • तुवरक के पके बीज के तेल को लगाने से त्वचा विकारों में लाभ होता है।

  • चालमोगरा (chalmugra) बीजों को गोमूत्र में पीसकर लगाने से खुजली में लाभ होता है।

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रक्त विकार में चालमोगरा के औषधीय गुण से लाभ (Chaulmoogra Oil Benefits in Blood Related Disorder in Hindi)

  • चालमोगरा तेल की 5 बूंदों को कैप्सूल में भरकर या मक्खन के साथ भोजन के आधा घण्टे बाद सुबह-शाम खाएं। इससे रक्त शुद्ध होता है और रक्त विकार ठीक होते हैं।

  • तुबरक (tubrak) तेल को नीम तेल या मक्खन में मिलाकर लेप करने से रक्त से जुड़े विकारों में लाभ होता है।

बालों के रोग में तुवरक के औषधीय गुण से फायदा (Benefits of Turvak for Hair Problem in Hindi)dcgyan

तुवरक रसायन का सेवन करने से मनुष्य चेहरे की झुर्रियां, सफेद बालों की समस्या से मुक्त होता है। चोलमागरा रसायन का सेवन करने से लोगों की याददाश्त बढ़ती है।

कंठ के रोग में तुवरक के फायदे (Benefits of Tuvarak Oil for Throat Disease in Hindi)

1 ग्राम चालमोगरा फल गिरी चूर्ण को दिन में तीन बार खाने से कंठमाला रोग में लाभ होता है। तुवरक के तेल को मक्खन में मिलाकर गांठों पर लेप करें। इससे कंठ पर होने वाले गांठ में लाभ होता है।

टीबी रोग में तुवरक के फायदे (Tuvarak Oil Benefits for TB Disease in Hindi)

तुबरक (tubrak) तेल की 5-6 बूंदों को दूध के साथ दिन में दो बार सेवन करें। इसके साथ ही मक्खन में मिलाकर छाती पर मालिश करें। इससे टीबी (क्षयरोग) रोग में लाभ (tuvrak ke fayde) होता है।

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एक्जीमा (पामा) में लाभकारी है चालमोगरा का उपयोग

तुवरक के बीजों को गोमूत्र में पीसकर लगाना चाहिए। यह खसरा में भी उपयोगी है।

चालगोगरा तेल निकालने एवं सिद्ध करने की विधि :

वर्षा ऋतु के आरम्भ में फल पक जाने पर वृक्ष से उन्हें तोड़ लेना चाहिये अन्यथा जंगली जानवर उन्हें नष्ट-भ्रष्ट कर देते हैं । जंगली सूअर एवं भालू इन फलों को बड़े चाव से खाते हैं।

इन फलों को 7 से 8 दिनों तक धान के तुष में दबाकर रखने से फल अच्छी तरह से पक्व हो जाते हैं। तब शीघ्र उनका तेल निकाल लेना चाहिये। अधिक पुराने फलों से निकाला गया तेल अधिक गुणकारी नहीं होता।

पके फलों के भीतर से बीज निकालकर सुखा लें, अच्छी तरह से सूख जाने पर ऊपर का छिलका दूर कर मज्जा (गिरी-मींगी) को कोल्हू द्वारा तेलनिकाल लें। तेलनिकालने के पश्चात् उसे छानकर काम में लावें। इससे जो तेल निकलता है वह प्रायः फलों का अष्टामांश होता है। इस विधि से निकाला गया तेल किंचित पीताभ होता हैं । गोवा के ग्रामीण जन इस विधि से ही तेल निकालते हैं।

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चालमोगरा के कुछ अन्य लाभप्रद अनुभूत प्रयोग :

1.कुष्ठनाशक चूर्ण

चालमोगरा की मींगी 250 ग्राम, नीम पत्ती, बीज (दोनों) 20 ग्राम, घुघकोरैया 125 ग्राम, कुठ 10 ग्राम, कुटकी 10 ग्राम, जावित्री 10 ग्राम, केशर 6 ग्राम । सभी का चूर्ण बनाकर रख लें।

मात्रा 3-3 ग्राम की मात्रा में प्रातः सायं मधु के साथ लें।

उपयोग यह समस्त कुष्ठनाशक योग है। लम्बे समय तक प्रयोग करना चाहिये। प्रयोग करने से पहले जुलाब लेकर पेट साफ करा देना चाहिये। – महन्त साधुशरणदास (धन्व. गुप्तसिद्ध प्रयोगांक)

2.चर्मरोग नाशक तेल

चालमोगरा बीज 60 ग्राम, चक्रमर्द बीज 125 ग्राम,बाकुची 60 ग्राम, अमलताश के बीज 125 ग्राम, काले धतूरे बीज 180 ग्राम, स्वर्णक्षीरी बीज 180 ग्राम, तुत्य 30 ग्राम, चौकिया सुहागा 120 ग्राम, सफेद राल 120 ग्राम, कसीस हरा 60 ग्राम, दाल चिकना 100 ग्राम, रसकर्पूर 20 ग्राम, हरताल 30 ग्राम, मैनसिल 30 ग्राम, गन्धक 60 ग्राम, फिटकरी 60 ग्राम, कबीला 40 ग्राम, नीम का तेल180 ग्राम, चालमोगरा तेल 180 ग्राम, गर्जन का तेल 180 ग्राम।

विधि प्रथम की 6 औषधियां स्वच्छ कर अलग रख दें। बाद की शेष 10 वस्तुओं को खूब बारीक पीसकर इन्हें खरल में डालें। फिर 3 दिन नीम के तेल में 3 दिन चालमोगरा के तेल में, 3 दिन गर्जन के तेल में खरल करें। पश्चात् प्रथम 6 औषधियों के साथ इन्हें मिलाकर पातालयन्त्र द्वारा तेल निकालकर सुरक्षित रखें। यह चर्म रोगा नाशक तेल है। यह प्रत्येक चर्म रोगों पर उपयोगी है। – सुधानिधि प्रयोग संग्रह

3.खुजली नाशक मिश्रण

चालमोगरा का तेल 113 ग्राम, टंकणक्षार 1.2 ग्राम, गन्धक 1.2 ग्राम, संतरे का रस 10 बूंद । चालमोगरे के तेल में गन्धक और सुहागे का क्षार मिलाकर ऊपर से संतरे का रस डाल दें, इससे गन्धक की सुगन्ध दूर हो जाती है। जहां-जहां खुजली हो वहां इस दवा को रोगी के लगावें और उसे धूप में लेटे रहने को कहें तथा दो घण्टे बाद स्नान करावें। इससे केवल 3-4 दिनों में ही भयंकर खुजली ठीक हो जाती है। – पं. सालिगराम पुजारी

4.उपदंशजन्य चर्मरोगहर प्रयोग

चालमोगरा के बीजों के साथ समभाग जंगली मूंग के बीज को जौकुट कर भृंगराज के स्वरस में तीन दिन भिगोकर महीन पीस उसमें थोड़ा चन्दन तेल या नारियल तेल या आंवला तेल मिलाकर उबटन जैसे मर्दन करें। फिर 3-4 घण्टे बाद.स्नान कर लें। इस प्रयोग से कुछ दिनों में उपदंश रोग के कारण उत्पन्न शरीर पर हुये चकत्ते मिटने लगते हैं। – व. गु०

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चालमोगरा से निर्मित आयुर्वेदिक दवा (कल्प) :-

वटी :–

  • चालमोगरा बीज, बाकुची बीज, चित्रक, हरिद्रा, विडंग, त्रिफला और शुद्ध भिलावा समान भाग लेकर गुड़ में मिलाकर 250 मि. ग्राम की गोलियां बना लें। 1 से 2 गोली दिन में 2 – 3 बार खाने से सब प्रकार के रक्त विकार, कुष्ठ आदि नष्ट होते हैं। – अभि. बू. द.

  • तुवरक  बीज, शुद्ध भिलावा, वाकुची बीज, शिलाजीत समभाग लेकर गोलियां बनाकर सेवन करने से कुष्ठ, वातरक्त नष्ट होकर बल-वीर्य की वृद्धि होती है।– अभि. बू. द.

चालमोगरा भस्म :–

तुवरक  की मींगी को बारीक पीसकर उसमें किंचित् इसी का तेल मिलाकर पुनः घोटकर मटकी में रखकर अच्छी तरह शराब सम्पुट कर कंडों की आंच में रखकर भस्म बना लें। इस अन्तर्धूम भस्म के अंजन से रतौधी, तिमिर (चीजें धुंधली दिखने लगती है) , श्वेत और नीला मोतिया बिन्दु,नेत्रव्रण आदि रोगों में लाभ होता है।

इस भस्म में सैन्धव लवण एवं स्रोतोञ्जन समभाग लेकर पीसकर लगाने से लेखन विशेष होता है। – सुश्रुतसंहिता

चालमोगरा मलहम :–

  • तुवरक तेल 4 ग्राम और सादा वैसलीन 30 ग्राम लेकर भलीभांति एकत्र फेंटकर मलहम तैयार कर लें। यह मलहम कुष्ठ, कण्डू (खाज, खुजली) पर वाह्य प्रयोग के लिये लाभप्रद है। – ध.व. वि.

  • चालमोगरा तेल, एरण्ड तेल समान भाग लेकर इनमें भली-भांति मिश्रण होने योग्य गन्धक, सिन्दूर मिला लें। फिर इसमें नींबू स्वरस डालकर खूब फेंटने से यह मलहम तैयार हो जायेगा। इसमें थोड़ा कपूर मिलाकर चौड़े मुख की शीशी में रखकर ढक्कन लगाकर रखें। आवश्यकता पड़ने पर थोड़ा-थोड़ा कुछ समय तक निरन्तर लगाने से फोड़े फुन्सी और खुजली मिट जाती हैं । – ध. व. वि.

तुवरक के उपयोगी भाग (Beneficial Part of Tuvarak (Chaulmoogra) Plant)

चालमोगरा के इन भागों का इस्तेमाल किया जाता हैः-

  • फलमज्जा

  • जड़ की छाल

  • फूल

  • पत्ते

  • बीज

  • तेल (chalmogra oil)

चालमोगरा  के सेवन की मात्रा (How Much to Consume Chaulmoogra?)

आप तुबरक (tubrak) के इन भागों का उपयोग कर सकते हैं :-

फलमज्जा  5-10 ग्राम

फूल5-10 ग्राम

पत्ते (बाह्य प्रयोग हेतु)

जड़ की छाल का काढ़ा50-60 मिली

चूर्ण1-3 ग्राम

तेल 5-10 बूंद

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चालमोगरा  के सेवन का तरीका (How to Use Chaulmoogra?)

यहां तुवरक (चालमोगरा) के फायदे और नुकसान के बारे में बहुत ही आसान भाषा में बताया गया है ताकि आप चालमोगरा (Chalmogra in Hindi) से पूरापूरा लाभ ले सकें, लेकिन किसी बीमारी के लिए तुवरक का उपयोग करने से पहले किसी आयुर्वेदिक चिकित्सक से जरूर सलाह लें।

  • बीज चूर्ण 1 से 3 ग्राम।

  • तेल संशमन हेतु – 10 मि.ली. संशमन हेतु 5 से 10 बूंद से क्रमशः बढ़ाकर कल्परूप में 50 से 60 बूंदें या इससे भी अधिक दिया जाता है। इसे घृत (घी), मक्खन, मलाई में मिलाकर या कैपसूल में रखकर देना चाहिये।

चालमोगरा  के नुकसान (Side Effects of Chaulmoogra):-

  1. इसका प्रयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिए, क्योंकि यह आमाशय को हानि पहुंचाता है। तेल को मक्खन में मिलाकर या कैप्सूल में भरकर भोजन के बाद ही लेना चाहिए।

  2. नुकसान की स्थिति में दूध-घी का सेवन करना चाहिए।

  3. क्वचित् शरीर में इसकी अधिक मात्रा पहुंच जाने से विविध उपद्रव होने लगते हैं।

  4. मन्दाग्नि वाले व्यक्ति को इसे सोच समझ कर देना चाहिए।

  5. अतिमात्रा अग्निमांद्य, वमन, अतिसार, रक्ताषुहानि, रक्तमेह, उरःशूल, उदरशूल, ज्वर, सन्धिप्रदाह, वृषणप्रदाह, नेत्रप्रदाह आदि उग्र लक्षण उत्पन्न कर सकती है । इसका प्रयोग सावधानीपूर्व ही करना चाहिए।

  6. चालमोगरा के सेवन से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श करें । चालमोगरा को डॉक्टर की सलाह अनुसार ,सटीक खुराक के रूप में समय की सीमित अवधि के लिए लें।

चालमोगरा  कहाँ पे पाया या उगाया जाता है (Where is Chaulmoogra Found or Grown?)

तुवरक (चालमोगरा) के वृक्ष दक्षिण भारत में पश्चिम घाट के पर्वतों पर पाए जाते हैं। इसके वृक्ष दक्षिण कोंकण और ट्रावनकोर में तथा श्रीलंका में बहुतायत से पाए जाते हैं।

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