चीड़ पेड़  के फायदे और नुकसान | Cheed Ped ke fayde | health benefits of Pine Tree  in hindi

चीड़ पेड़  के फायदे और नुकसान | Cheed Ped ke fayde | health benefits of Pine Tree  in hindi

धूपसरल पेड़  परिचय :-

उत्तराखंड या हिमाचल में जब भी आप सैर के लिए जाते होंगें आपकी नजर चीड़ के ऊंचे ऊंचे पेड़ों पर पडती होगी. आयुर्वेद में इस पेड़ को सेहत के लिए बहुत उपयोगी माना गया है. चीड़ के पेड़ की लकडियां, इससे निकलने वाले तारपीन के तेल और चिपचिपे गोंद का इस्तेमाल औषधि के रूप में किया जाता है. चीड़ के पेड़ से निकलने वाले गोंद को गंधविरोजा नाम से जाना जाता है.

चीड़ पेड़  क्या है (What is Pine Tree ?)

धूपसरल (चीड़ )एक बहुआयामी और बहुउपयोगी वृक्ष है। इसकी फुनगियों पर बसंत आते ही सुकोमल, रंगबिरंगे फूल खिल उठते हैं। फूलों की सुगन्ध जब वातावरण में व्याप्त हो जाती है तो मानवों का तनमन भी महकने लगता है और यह महक हमें स्वस्थ बनाने में सहायक होती है। ऐसा माना जाता है कि चीड़ के फूलों की महक इसके नुकीले किन्तु विशेष आकार के पत्तों की हवा हमें स्वास्थ्यवर्धक सांसें देने में कमाल का काम करती हैं।

इनकी चितकबरी पीठ और भुजाओं के समान फैली हुई शाखायें छोटेछोटे नुकीले पत्रों के गुच्छों से परिवेष्टित बड़ी भली मालूम पड़ती है।

बिना पुष्पों के ही ये पत्रगुच्छ हरित पुष्पों से जान पड़ते हैं तेज हवा के आवेग से जब ये शाखायें झूमती हैं, तब तो उनकी शोभा देखते ही बनती है। मार्ग के दोनों ओर की पहाड़ियों पर ये वृक्ष हिमालय के इन शिखरों को निराली शोभा प्रदान करते हैं। जहाँ पर अन्य वृक्ष नहीं हैं वहाँ पर तो यह शोभा अधिक सुन्दर हो जाती है। देवदार और चीड़ दोनों भाइयों की तरह दिखलाई देते हैं। चीड़ का भी तो कुल देवदारु कुल ( पाइनेसी) ही है।

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अनेक भाषाओं में चीड़ पेड़  के नाम (Pine Tree  Called in Different Languages)

  • हिंदी :– चीढ़, चीड़, धूपसरल;

  • संस्कृत नाम :– सरल, पीतवृक्ष, सुरभिदारुक;

  • English :– चीर पाईन (Chir pine), इमोडी पाईन (Emodi pine)

  • Scientific Names :– पाइनस् रॉक्सबर्घियाई Pinus roxburghii Sargent है. यह Pinaceae (पाइनेसी) कुल का पौधा है.

  • Kannad :- सरल (Sarala)

  • Gujrati :- सरल देवदार (Sarala devdar), तेलियो देवदार (Teliyo devdar)

  • Telugu :- देवदारु चेट्टु (Daevadaaru chettu), सरल (Sarala)

  • Tamil :- शिरसाल (Shirsaal), सीमाई देवदारी (Simai devadari)

  • Nepali :- धूप सलसी (Dhup salasi), रानी सल्लो (Ranisallo), खोटे सलो (Khote sallo), साला (Salla); Bengali : सरलगाछ (Saralagach), तार्पीन तैलेर गाछ (Tarpin tailer gach)

  • Marathi :- सरल (Saral), सरल देवदारा (Sarala devdara)

  • Malyalam :- सरलम (Saralam)

  • Arabi :- सत बिरोजा (Sat biroza), शज्रतुल् बक (Shajrtul bak), सनोवर हिन्दी (Sanovar hindi);

  • Persian :- समाधे सेनोबर (Samaghe sanobar), काज (Kaaz), दरख्ते वसक (Darakhte vasak)

चीड़ पेड़   के द्रव्यगुण

  • रस (taste on tongue):- कटु, तिक्त मधुर

  • गुण (Pharmacological Action): लघु, तीक्ष्ण, स्निग्ध

  • वीर्य (Potency): उष्ण

  • विपाक (transformed state after digestion):- कटु

चीड़ पेड़  के गुण : Properties of Pine Tree

धूपसरल (चीड़ ) कटु, मधुर, तिक्त, उष्ण, लघु, स्निग्ध, कफवातशामक, कान्ति दायक, दुष्टव्रण शोधक, वृष्य, दीपन तथा कोष्ठशोधक होता है।

यह कर्णरोग, कण्ठरोग, अक्षिरोग, स्वेद, दाह, कास, मूर्च्छा, व्रण, भूतदोष कृमि, त्वक्-विकार, शोफ, कण्डू, कुष्ठ, अलक्ष्मी, व्रण, यूका, ज्वर, दौर्गन्ध्य तथा अर्शनाशक होता है।

चीड़ का तैल कटु, तिक्त, कषाय, दुष्टव्रण विशोधक, शुक्रमेह, कृमि, कुष्ठ, वातविकार तथा अर्श नाशक होता है।

अत्यधिक मात्रा में सेवन करने से, पित्तविकार तथा भम को उत्पन्न करने वाला होता है।

इसका काष्ठ सर्पदंश, वृश्चिकदंश तथा शारीरिक दाह में लाभप्रद होता है।

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चीड़ के पेड़ का रासायनिक विश्लेषण : Pine Tree (Cheed) Chemical Constituents

धूपसरल के कांड में क्षत करने से एक तैलीय राल-गोंद निकलता है इसे ही श्रीवेष्टक, सरल निर्यास (गंधा बिरोजा) कहते हैं। इस गन्धा बिरोजा से परिस्रवण विधि के द्वारा जो तैल प्राप्त होता है, उसे तारपीन का तेल (टर्पेन्टाइन आयल) कहते हैं। इसे खन्नु तेल या खन्ना का तेल भी कहते हैं।

गंधा बिरोजा से लगभग 20 प्रतिशत यह तैल निकलता है। शेष 80 प्रतिशत भाग कोरेझिन या कोलोफोनि कहते हैं ।

तारपान तेल स्वच्छ रंगीन एवं विशिष्ट प्रकार की गन्ध से युक्त होता है। इसमें पाइनिन, कैरीन, लोगिफोलिन तथा अन्य टर्पिन पाये जाते हैं। भारतीय व्यापारी तेल में कई पदार्थों का मिश्रण कर देते हैं।

बिरोजे का सत्व एक पात्र में दूध और जल समभाग लें, उस पर कपड़ा बांध, उसके ऊपर गंधा बिरोजा डालकर, नीचे आग देने से यह टपक कर नीचे के पात्र में जम जाता है। इसे बिरोजे का सत्व कहते हैं।

तारपीन तेल (टर्पेन्टाइन आयल) के फायदे और उपयोग : Uses and Benefits of Turpentine Oil

  • (टर्पेन्टाइन आयल) तारपीन तेल कटु, तिक्त, उष्ण वातानुलोमन, आंत्र आमाशय उद्दीपक, अल्प मात्रा में सेवन से हृदय उत्तेजक अधिकमात्रा में हृदयावसादक, रक्तस्तम्भक, मूत्रल एवं रक्तातिसार उत्पन्न करने ( अधिक मात्रा) वाला है।

  • तारपीन तेल से शरीर पर मर्दन करने से प्रारम्भ में त्वचा लाल होकर उसमें प्रक्षोभ (घबराहट) उत्पन्न होता है। इसके बाद नाड़ियों के अग्रभाग में अवसाद होकर शून्यता आ जाती है।

  • इससे सूक्ष्म रक्त वाहिनियों का संकोच होकर स्थानीय रक्तस्राव बन्द हो जाता है। किन्तु इसके अधिक मर्दन से त्वचा पर स्फोट (फोड़ा) हो जाते हैं।

  • गृध्रसीशूल (साइटिका), कटिशूल (कमरदर्द), संधिवात, जीर्ण आमवात, वातरक्त आदि में इसके मर्दन से लाभ होता है।

  • सूतिका रोग (प्रसव के उपरान्त स्त्री के शरीर में होने वाले रोग) में आक्षेप (एक बात रोग जिसमें हाथ पैर रह रहकर ऐंठतें और काँपते हैं) आने पर भी तारपीन तेल की मालिश करायी जाती है।

  • न्यूमोनिया (श्वसनक ज्वर) में जब पसली का दर्द असह्य होता है तब इस तारपीन तेल को जैतून के तैल या नारायण तैल में मिलाकर छाती पर अभ्यंग करना चाहिये और गर्म किये हुये लवण से सेक करना चाहिये ।

  • किसी भी प्रकार के दर्द को दूर करने के लिये पहले तारपीन तेल की मालिश करें तथा बाद में फलालेन (रोंएँदार वस्त्र) के एक टुकड़े को गर्मपानी में डुबोकर उसे निचोड़ कर पीड़ित स्थान पर रखकर दबायें। ऐसा कई बार करें। इससे भी वातिकशूल मिटते हैं अथवा 500 मि.लि. तेल में कपूर 50 ग्राम मिलाकर भी हल्के हाथ से मालिश करनी चाहिए।

  • गुदमार्ग से इसकी पिचकारी लगाना पेट के फूलने में उपकारक है। इससे आंतों की वायु बाहर निकलती है।

  • यदि आंतों से रक्त स्राव हो रहा हो तो वह भी इसके व्यवहार से बन्द हो जाता है। आंतों के घाव में यह उपयोगी है।

  • आंतों के कृमियों को निकालने के लिये भी तारपीन तेल का एनिमा लगाने से लाभ होता है। यह एनिमा साथ में एरण्ड तैल भी मिलाकर लगाया जा सकता है किन्तु एनिमा सावधानीपूर्वक लगाना चाहिये।

  • अग्निदग्ध, सद्योव्रण, दाद-खुजली आदि पर इस तैल को लगाने से लाभ होता है।

  • आध्मान में पेट के फूलने पर तैल लगाकर धीरे-धीरे मालिश करनी चाहिये।

  • फुन्सियों पर तारपीन तेल लगाकर धोने से वे ठीक होती हैं।

  • कील-मुंहासों पर भी इसे लगाकर धोने से लाभ होता है।

  • हैजा, प्लेग, मौसमी बुखार एवं अन्य संक्रामक रोगों से बचने के लिये 25 मि.लि. तारपीन तेल में 6 ग्राम कपूर तथा आधा किलो हवन सामग्री मिलाकर हवन करते रहने से दूषित कीटाणु नष्ट होते हैं तथा रोगों के आक्रमण का भय नहीं रहता।

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चीड़ पेड़  से विभिन्न रोगों का सफल उपचार : Pine Tree  benefits and Uses (labh) in Hindi

मुंह के छालों को ठीक करता है चीड़ (Pine Helps in treatment of Mouth Ulcers in Hindi)

अक्सर गलत खानपान, पेट की गर्मी और खराब दिनचर्या के कारण मुंह में छालों की समस्या होती है. घरेलू उपचारों की मदद से आप आसानी से मुंह के छालों का इलाज कर सकते हैं. चीड़ के पेड़ से प्राप्त गोंद (गंधविरोजा) का काढ़ा बनाकर कुल्ला करने से मुंह के छाले ठीक होते हैं।

पेट के कीड़ों को नष्ट करता है चीड़ (Cheed or Pine kills Stomach worms in Hindi)

(Cheed ke fayde) पेट में कीड़े होने पर रुक-रुक कर पेट में दर्द होना और भूख ना लगने जैसे लक्षण नजर आते हैं. इससे आराम पाने के लिए आप चीड़ का उपयोग कर सकते हैं. इसके लिए चीड़ के तेल में आधा भाग विडंग के चावलों का चूर्ण मिलाकर धूप में रखकर पिलाएं. इसे पिलाने और वस्ति देने से आंत से कीड़े खत्म हो जाते हैं.

पेट फूलना (Bloating) : अगर आप पेट फूलने की समस्या से परेशान हैं तो चीड़ के तेल को पेट में लगाएं. इस तेल को पेट में लगाने से या वस्ति देने से पेट फूलना और बवासीर जैसी समस्याओं में फायदा मिलता है.

कान के रोगों में उपयोगी है चीड़ (Benefits of Pine for Ear Problems in Hindi)

कान से चिपचिपे तरल का स्राव होना और कान में दर्द और सूजन, ये कान से जुड़ी मुख्य समस्याएं हैं. अगर आप इन समस्याओं से परेशान रहते हैं तो चीड़ का उपयोग करें. आयुर्वेदिक विशेषज्ञों के अनुसार देवदारु, कूठ और सरल के काष्ठों पर क्षौम वत्र लपेट कर तिल तैल में भिगोकर जलाएं। इसे जलाने से मिलने वाले तेल की एक दो बूँद कान में डालें. यह तेल कान के दर्द, सूजन और स्राव से जल्दी आराम दिलाता है.

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सांस की नली में सूजन को कम करता है चीड़ (Pine Benefits for Bronchitis in Hindi)

सांस की नली में सूजन होना एक गंभीर समस्या है. विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ विशेष घरेलू उपायों की मदद से इस समस्या से राहत पायी जा सकती है. इसके लिए चीड़ के तेल से छाती पर मालिश करें. इसकी मालिश से सांस नली की सूजन कम होने के साथ साथ सर्दी-खांसी में भी फायदा मिलता है.

चीड़ की लकड़ी के चूर्ण में अगरु, कूठ, सोंठ तथा देवदारु चूर्ण को बराबर मात्रा में मिलाकर रख लें। इस चूर्ण की 2-4 ग्राम मात्रा गोमूत्र या कांजी में पीसकर पिएं. इसे पीने से सर्दी-खांसी में जल्दी आराम मिलता है।

लकवा के इलाज में फायदा पहुंचाता है चीड़ (Pine helps in Treatment of Paralysis in Hindi)

पिप्पली, पिप्पली की जड़, सरल और देवदारु को मिलाकर पेस्ट बना लें. इस पेस्ट की 1-3 ग्राम मात्रा में 2 गुना शहद मिलाकर पीने से लकवा रोग में फायदा मिलता है। इसका उपयोग आयुर्वेदिक चिकित्सक के सलाह अनुसार ही करें.

घाव को जल्दी भरने में मदद करता है चीड़ (Uses of Pine in Wound Healing in Hindi)

चीड़ के पेड़ से निकलने वाले गोंद (गंधविरोजा)  के उपयोग से घाव जल्दी ठीक होते हैं. इसके लिए गोंद को पीसकर सीधे घावों पर लगाएं. इसके प्रयोग से कुछ ही दिनों में घाव ठीक होने लगता है.  इसके अलावा चीड़ की सूचियों (Needles) को पीसकर घाव पर लगाने से घाव जल्दी भर जाते हैं।

दाद खाज खुजली को दूर करता है चीड़ (Pine Benefits for Itching and Ringworm in Hindi)

दाद की समस्या होने पर या खुजली होने पर भी आप चीड़ का उपयोग घरेलू इलाज के रूप में कर सकते हैं. इसके लिए चीड़ की गोंद (गंधविरोजा) को दाद या खुजली वाली पर लगाएं. इसके प्रयोग से कुछ ही दिनों में दाद व खुजली  की समस्या ठीक हो जाती है.

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बच्चों की पसली चलने की समस्या को ठीक करता है चीड़ (Uses of Pine in Treatment of Pneumonia in Hindi)

छोटे बच्चों को अक्सर सर्दी लग जाने पर या निमोनिया होने पर पसलियां चलने की समस्या हो जाती है. इसके इलाज में आप चीड़ का उपयोग कर सकते हैं. इसके लिए चीड़ के तेल में बराबर मात्रा में सरसों का तेल मिलाकर इससे बच्चों की मालिश करें. इस तेल की मालिश से तुरंत गर्माहट मिलती है और बच्चों को जल्दी आराम मिलता है.

सुजाक (गोनोरिया) :

(क) शुद्ध बिरोजा (बिरोजे का सत्व) 10 ग्राम, शुद्ध राल 25 ग्राम, गूगल 50 ग्राम, रूमीमस्तंगी 25 ग्राम तथा चन्दन का तैल 25 ग्राम इन सबको घोटकर एक एक ग्राम की गोलियां बना लें। दिनभर में चार-पांच गोलियां सेवन कर ऊपर दारूहल्दी का क्वाथ पीना चाहिए।

(ख) शुद्ध बिरोजा (बिरोजे का सत्व) 25 ग्राम, छोटी इलायची के बीज 10 ग्राम और मिश्री 60 ग्राम का बारीक चूर्ण कर 5-6 ग्राम चूर्ण दूध-जल की लस्सी या शीतल जल के साथ दिन में दो बार सेवन कराने से सुजाक एवं तज्जन्य कष्टों का निवारण होता है।

(ग) बिरोजा सत्व (शु. बिरोजा) 50 ग्राम में मकरध्वज या षड्गुण बलजारित रस सिन्दूर 8 ग्राम लेकर इनका अच्छी तरह मर्दन कर 1-2 ग्राम दिन में दो बार ताजा दूध या मिश्री मिश्रित जल के साथ सेवन करने से लाभ होता है। इससे सुजाक, मूत्रकृच्छ्र, मूत्रदाह आदि मिटते हैं। इसके सेवन से मूत्र प्रसेकनलिका का घाव भरने लगता है और उससे पूय (पस)आना बन्द होता है।

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चीड़ के पेड़ का उपयोगी भाग : Beneficial Part of Pine Tree (Cheed) in Hindi

काष्ठ, निर्यास (गोंद / गंधा बिरोजा) तथा तेल (तारपीन का तेल / टर्पेन्टाइन आयल)

चीड़ पेड़  के सेवन की मात्रा (How Much to Consume Pine Tree ?)

  • काष्ठ चूर्ण1 से 3 ग्राम

  • निर्यास (गोंद / गंधा बिरोजा) – 1 से 2 ग्राम

  • तेल1 से 3 बूंद

चीड़ पेड़  के सेवन का तरीका (How to Use Pine Tree ?)

अगर आप चीड़ के चूर्ण का उपयोग का रहे हैं तो 2-3 ग्राम की मात्रा में करें वहीं अगर आप चीड़ के तेल का उपयोग कर रहे हैं तो 2-5 बूंद का प्रयोग करें. ध्यान रखें कि अगर आप किसी गंभीर बीमारी के घरेलू इलाज के रूप में चीड़ का उपयोग करने की सोच रहे हैं तो पहले आयुर्वेदिक चिकित्सक से सलाह लें.

चीड़ पेड़  के नुकसान (Side Effects of Pine Tree ):-

  •  (Cheed )चीड़ के उपयोगी अंगों का अधिक मात्रा में सेवन करने से वमन, अतिसार, नाड़ीमन्दता, मूत्रदाह एवं मूत्ररक्तता के लक्षण उत्पन्न होते हैं।

  • इसकी अधिकमात्रा से मस्तिष्क प्रभावित होने पर तन्द्रा, अवसाद, संज्ञानाश एवं पक्षाघात हो जाने की संभावना हो जाती है।

  • वृक्क (किडनी) रोगियों को यह नहीं देना चाहिए।

  • कतीरा गोंद, बबूल का गोंद और मीठे बादाम का तैल इसके अहितकर प्रभाव को दूर करते हैं। साथ में रोगी की दशा के अनुसार हृद्य, बल्य, विषघ्न द्रव्यों की भी समुचित योजना करनी चाहिये।

  • चीड़ के औषधीय उपयोग से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श करें ।

चीड़ का पेड़ कैसा होता है ? :

धूपसरल (चीड़) के वृक्ष बहुत ऊँचे प्राय: 100-125 फीट ऊँचे होते हैं। काण्ड की परिधि प्राय: 12 फुट होती है। इसकी शाखायें इस प्रकार क्रम से लगातार निकलती हैं, कि वृक्ष का शीर्ष भाग गोलाकार दिखाई देता है।

वृक्ष की शिखा गोल पुच्छाकार, नाचते हुये मोर की तरह होती है। वृक्ष की छाल एक से दो इंच मोटी, बाहर से रक्ताभ धूसर तथा भीतर गहरे लाल रंग की होती है। काण्ड पर बने हुये असामान्य चकत्ते इसे एक विशेष पहचान देते हैं।

  • चीड़ के पत्ते देवदार के पत्र छोटे और चीड़ के लम्बे (तिगुने) होते हैं, जो कि शल्य कार्य में आने वाली सूई के समान होते हैं। ये पत्र एक कलामय कोष से आवृत तथा नीचे की ओर झुके होते हैं।

  • धूपसरल (चीड़ के) फूल इसके पुष्प गुच्छों के रूप में निकलते हैं। ये भूरे रंग के तथा 4 से 8 इंच लम्बे होते हैं।

  • चीड़ के फल चीड़ के पेड़ में पुष्प के बाद फल लगते हैं जो कि देवदार फल की तरह, किन्तु आकार में बड़े होते हैं। इसके बीज देवदार के बीज से लम्बे, चिलकोजे की तरह, परन्तु अंडाकार होते हैं। बीज के गले पद्रेश पर तितली के पंख की तरह एक पत्ता सा होता है।

इस पर पुष्प जनवरी में आते हैं, फल अगले वर्ष जून-जुलाई में प्रौढ़ हो जाते हैं। उसके अगले वर्ष ग्रीष्म ऋतु में ये फूट जाते हैं जिनसे बीज बाहर निकल जाते है। इस प्रकार पूरी प्रक्रिया में लगभग 26 महीने लग जाते हैं।

चीड़ पेड़  कहाँ पे पाया या उगाया जाता है (Where is Pine Tree  Found or Grown?)

(Cheed) चीड़ के वृक्ष हिमालय प्रदेश में बहुतायत से पाये जाते हैं। हिमालय के चंबा, गढ़वाल, अल्मोड़ा कांगड़ा, मंडी, सिरमौर, सोलन, शिमला, किन्नोर, कुल्लु आदि के क्षेत्रों को चीड़ की उपस्थिति ने सौम्य एवं हरा-भरा बनाया है। यहाँ के निवासी जीवन पर्यन्त चीड़ का प्रयोग किसी न किसी रूप में करते रहते हैं। ये सीधे सरल वृक्ष विरलों को ही प्राप्त होते हैं और बहुत कम मिलते हैं

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