काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग / Kashi Vishwanath Jyotirlinga

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग / Kashi Vishwanath Jyotirlinga

भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में शामिल उत्तरप्रदेश की प्राचीन धार्मिक नगरी वाराणसी में सोमवार को सावन के तीसरे सोमवार के मौके पर ‘काशी विश्वनाथ’ के जलाभिषेक एवं पूजन-दर्शन के लिए यहां आए लाखों देशी-विदेशी शिवभक्तों के ‘हर-हर महादेव, बम-बम भोले, बम-बम लहरी’ के जयकारे से आकाश गूंजायमान रहा।

तीनों लोकों में न्यारी इस धार्मिक नगरी में हजारों साल पूर्व स्थापित श्री काशी विश्वनाथ मंदिर विश्वप्रसिद्ध है। हिन्दू धर्म में सर्वाधिक महत्व के इस मंदिर के बारे में कई मान्यताएं हैं। माना जाता है कि भगवान शिव ने इस ‘ज्योतिर्लिंग’ को स्वयं के निवास से प्रकाशपूर्ण किया है। पृथ्वी पर जितने भी भगवान शिव के स्थान हैं, वे सभी वाराणसी में भी उन्हीं के सान्निध्य में मौजूद हैं। भगवान शिव मंदर पर्वत से काशी आए तभी से उत्तम देवस्थान नदियों, वनों, पर्वतों, तीर्थों तथा द्वीपों आदि सहित काशी पहुंच गए।

विभिन्न ग्रंथों में मनुष्य के सर्वविध अभ्युदय के लिए काशी विश्वनाथजी के दर्शन आदि का महत्व‍ विस्ता‍रपूर्वक बताया गया है। इनके दर्शन मात्र से ही सांसारिक भयों का नाश हो जाता है और अनेक जन्मों के पाप आदि दूर हो जाते हैं।

काशी विश्वेश्वर लिंग ज्योतिर्लिंग है जिसके दर्शन से मनुष्य परम ज्योति को पा लेता है। सभी लिंगों के पूजन से सारे जन्म में जितना पुण्य मिलता है, उतना केवल एक ही बार श्रद्धापूर्वक किए गए ‘विश्वनाथ’ के दर्शन-पूजन से मिल जाता है। माना जाता है कि सैकड़ों जन्मों के पुण्य के ही फल से विश्वनाथजी के दर्शन का अवसर मिलता है।

गंगा नदी के तट पर विद्यमान श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में वैसे तो सालभर यहां श्रद्धालुओं द्वारा पूजा-अर्चना के लिए आने का सिलसिला चलता रहता है, लेकिन सावन आते ही इस मोक्षदायिनी मंदिर में देशी-विदेशी श्रद्धालुओं का जैसे सैलाब उमड़ पड़ता है।

विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में उपलब्ध जानकारी के मुताबिक यह सिलसिला प्राचीनकाल से चला आ रहा है। इस मंदिर में दर्शन-पूजन के लिए आने वालों में आदिशंकराचार्य, संत एकनाथ, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, महर्षि स्वामी दयानंद, गोस्वामी तुलसीदास जैसे सैकड़ों महापुरुष शामिल हैं।

वर्ष 1676 ई. में रीवा नरेश महाराजा भावसिंह तथा बीकानेर के राजकुमार सुजानसिंह काशी यात्रा पर आए थे। उन्होंने विश्वेश्वर के निकट ही शिवलिंगों को स्थापित किया।

हिन्दू वास्तुकला की यह अनमोल धरोहर इंदौर की महारानी अहिल्याबाई द्वारा वर्ष 1780 ई. में बनवाई गई थी। मंदिर का निर्माण वर्ष 1780 में भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पूर्ण हुआ था। वर्तमान मंदिर का स्वरूप और परिसर आज मूल रूप से वैसे का वैसा ही है, जैसा कि महारानी अहिल्याबाई द्वारा वर्ष 1780 ई. में बनवाया गया होगा। पंजाब के महाराजा रणजीतसिंह ने वर्ष 1853 में 1,000 किलोग्राम शुद्ध सोने से मंदिर के शिखरों को स्वर्ण मंडित किया जिसका स्वरूप आज भी विद्यमान है।

मोक्ष लक्ष्मीविलास मंदिर के ही समान इस मंदिर में 5 मंडप बनाने का प्रयत्न किया गया लेकिन विश्वनाथजी के कोने में होने के कारण पूर्व दिशा में मंडप नहीं बन पाया। यही वजह है कि पूर्व दिशा में मंदिर का विस्तार किया गया है। इस विस्तृत प्रांगण में दोनों ओर शाला मंडप निर्मित हैं। हालांकि उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा मंदिर परिसर का विस्तार किया जा रहा है। मंदिर के शिखर पर जहां तक स्वर्णमंडन हुआ है, उसके नीचे के भाग को भी स्वर्णमंडित किए जाने का प्रयत्न वर्तमान मंदिर प्रशासन द्वारा किया जा रहा है।

श्रुति स्मृति इतिहास तथा पुराणादि के अनुसार काशी सकल ब्रह्मांड के देवताओं की निवास स्थली है, जो शिव को अत्यंत प्रिय है। काशी में शिव के अनेकानेक रूप विग्रह, लिंग आदि की पूजा-अर्चना की जाती है।

शिवपुराण के अनुसार काशी में देवाधिदेव विश्वनाथजी का पूजन-अर्चन सर्व पापनाशक, अनंत अभ्युदयकारक, संसाररूपी दावाग्नि से दग्ध जीवरूपी वृक्ष के लिए अमृत तथा भवसागर में पड़े प्राणियों के लिए मोक्षदायक माना जाता है।

ऐसी मान्यता है कि वाराणसी में मनुष्य के देहावसान पर स्वयं महादेव उसे मुक्तिदायक तारक मंत्र का उपदेश करते हैं। पौराणिक मान्यता है कि काशी में लगभग 511 शिवालय प्रतिष्ठित थे। इनमें से 12 स्वयंभू शिवलिंग, 46 देवताओं द्वारा, 47 ऋषियों द्वारा, 7 ग्रहों द्वारा, 40 गणों द्वारा तथा 294 अन्य‍ श्रेष्ठ शिवभक्तों द्वारा स्थापित किए गए हैं।

काशी या वाराणसी भगवान शिव की राजधानी मानी जाती है इसलिए अत्यंत महिमामयी भी है। अविमुक्त क्षेत्र, गौरीमुख, त्रिकंटक विराजित, महाश्मशान तथा आनंद वन प्रभृति नामों से मंडित होकर गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों वाली है।

क्या है मान्यता

हिंदू धर्म में काशी विश्वनाथ का अत्यधिक महत्व है। कहते हैं काशी तीनों लोकों में न्यारी नगरी है, जो भगवान शिव के त्रिशूल पर विराजती है। मान्यता है कि जिस जगह ज्योतिर्लिग स्थापित है वह जगह लोप नहीं होती और जस का तस बना रहती है। कहा जाता है कि जो श्रद्धालु इस नगरी में आकर भगवान शिव का पूजन और दर्शन करता है उसको समस्त पापों से मुक्ति मिलती है।

इतिहास

इस मंदिर का 3,500 वर्षो का लिखित इतिहास है। इस मंदिर का निर्माण कब किया गया था इसकी जानकारी तो नहीं है लेकिन इसके इतिहास से पता चलता है कि इस पर कई बार हमले किए गए लेकिन उतनी ही बार इसका निर्माण भी किया गया। बार-बार के हमलों और पुन: निर्मित किये जाने के बाद मंदिर के वर्तमान स्वरूप का निर्माण 1780 में इंदौर की महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने करवाया था।

पौराणिक कथा

काशी विश्वनाथ च्योतिर्लिग के संबंध में भी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार जब भगवान शंकर पार्वती जी से विवाह करने के बाद कैलाश पर्वत रहने लगे तब पार्वती जी इस बात से नाराज रहने लगीं। उन्होंने अपने मन की इच्छा भगवान शिव के सम्मुख रख दी। अपनी प्रिया की यह बात सुनकर भगवान शिव कैलाश पर्वत को छोड़ कर देवी पार्वती के साथ काशी नगरी में आकर रहने लगे। इस तरह से काशी नगरी में आने के बाद भगवान शिव यहां च्योतिर्लिग के रूप में स्थापित हो गए। तभी से काशी नगरी में विश्वनाथ च्योतिर्लिग ही भगवान शिव का निवास स्थान बन गया। माना यह भी जाता है कि काशी विश्वनाथ च्योतिर्लिग किसी मनुष्य की पूजा, तपस्या से प्रकट नहीं हुआ, बल्कि यहां निराकार परमेश्वर ही शिव बनकर विश्वनाथ के रूप में साक्षात प्रकट हुए।

हिंदुओं का सबसे पूज्य मंदिर

यह काशी विश्वनाथ मंदिर हिंदू मंदिरों में अत्यंत प्राचीन है। मंदिर के शिखर पर स्वर्ण लेपन होने के कारण इसे स्वर्ण मंदिर भी कहते हैं। इस पर महाराजा रणजीत सिंह ने अपने शासन काल के दौरान स्वर्ण लेपन करवाया था। मंदिर के अंदर चिकने काले पत्थर से बना हुआ शिवलिंग है। मंदिर के ठीक बगल में ज्ञानवापी मस्जिद है। फाल्गुन शुक्ल एकादशी (23 मार्च) को यहां श्रृंगारोत्सव का आयोजन होता है।

काशी विश्वनाथ की भव्य आरती

यहां काशी विश्वनाथ में की जाने वाली आरती विश्वभर में प्रसिद्ध है। यहां दिन में पांच बार आरती आयोजित की जाती है। मंदिर रोजाना 2.30 बजे खुल जाता है। बाबा विश्वनाथ के मंदिर में तड़के सुबह की मंगला आरती के साथ पूरे दिन में चार बार आरती होती है। भक्तों के लिए मंदिर को सुबह 4 से 11 बजे तक के लिए खोल दिया जाता है फिर आरती होने के पश्चात दोपहर 12 से सायं 7 बजे तक दोबारा भक्तजन मंदिर में पूजा कर सकते हैं। सायं सात बजे सप्त ऋषि आरती का वक्त होता है। उसके बाद 9 बजे तक श्रद्धालु मंदिर में आ जा सकते हैं। 9 बजे भोग आरती शुरू की जाती है इसके बाद श्रद्धालुओं के लिए मंदिर में प्रवेश वर्जित है। रात 10.30 बजे शयन आरती का आयोजन किया जाता है। मंदिर रात 11 बंद कर दिया जाता है।

कहां ठहरें

वाराणसी शहर देश का एक महत्वपूर्ण पर्यटन और तीर्थ स्थल है। यहां पर आपके बजट के मुताबिक हर तरह के सस्ते और महंगे होटल मिल जाएंगे। होटलों में ताज गंगा, सुरभि इंटरनेशनल, वाराणसी अशोक यह कुछ ऐसे होटल हैं जो काशी विश्वनाथ मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित हैं।

कैसे पहुंचें

उत्तर भारत में स्थापित श्री विश्वेश्वर (काशी विश्वनाथ) च्योतिर्लिग के दर्शन करने के लिए आपको सबसे पहले वाराणसी शहर में आना होगा। इसके लिए यातायात की अच्छी व्यवस्था की गई है। आप या तो हवाई यात्रा करके वाराणसी पहुंच सकते हैं या फिर रेल और सड़क के जरिए पवित्र काशी नगरी जा सकते हैं।

वाराणसी सिटी से 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित लाल बहादुर शास्त्री एयरपोर्ट यहां का नजदीकी एयरपोर्ट है। यह एयरपोर्ट देश के बड़े पर्यटन स्थलों से सीधे रूप से जुड़ा हुआ है। दिल्ली, आगरा, मुंबई, चेन्नई, कलकता, लखनऊ और खजुराहों से सीधे वाराणसी के लिए फ्लाइट है।

काशी विश्वनाथ नगर देश के सभी मेट्रो और बड़े शहरों से ट्रेन के जरिए जुड़ा हुआ है। वाराणसी रेलवे स्टेशन उत्तर भारत का एक बड़ा रेलवे जंक्शन है। यहां दिल्ली, कलकता और पटना से नियमित रूप से कई ट्रेनें चलती हैं। वाराणसी से 18 किलोमीटर की दूरी पर मुगलसराय रेलवे स्टेशन है जहां से पश्चिम से पूर्व की ओर जाने वाली कई ट्रेनें गुजरती हैं। आप चाहे तो मुगलसराय भी उतरकर बस या ऑटो के जरिए वाराणसी पहुंच सकते हैं। वाराणसी का यह पवित्र शहर दिल्ली से कलकता की ओर जाने वाली नेशनल हाईवे (2) से जुड़ा हुआ है। सड़क के जरिए वाराणसी शहर इलाहाबाद से 128 किलोमीटर, बोधगया से 240 किलोमीटर और लखनऊ से 286 किलोमीटर की दूरी पर है।

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